व्यक्तित्व का विकास - स्वामी विवेकानन्द Vyaktitwa Ka Vikas - Hindi book by - Swami Vivekanand
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व्यक्तित्व का विकास

स्वामी विवेकानन्द

ebook
प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :134 पुस्तक क्रमांक : 9606

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मनुष्य के सर्वांगीण व्यक्तित्व विकास हेतु मार्ग निर्देशिका

'हे अमृत के पुत्रो!'

कैसा मधुर और आशाजनक सम्बोधन है यह!

बन्धुओ! इसी मधुर नाम - 'अमृत के अधिकारी' से तुम्हें सम्बोधित करूं, तुम मुझे इसकी अनुमति दो। निश्चय ही हिन्दू तुम्हें पापी कहना अस्वीकार करता है। तुम तो ईश्वर की सन्तान हो, अमर आनन्द के भागी हो, पवित्र और पूर्ण आत्मा हो। तुम इस मर्त्यभूमि पर देवता हो।

तुम भला पापी? मनुष्य को पापी कहना ही पाप है, वह मानव-स्वरूप पर घोर लांछन है।

तुम उठो! हे सिंहो, आओ और इस मिथ्या भ्रम को झटककर दूर फेंक दो कि तुम भेड़ हो। तुम हो अमर आत्मा, मुक्त आत्मा, नित्य और आनन्दमय!

तुम जड़ नहीं हो, तुम शरीर नहीं हो; जड़ तो तुम्हारा दास है, न कि तुम जड़ के दास हो।'

(यहाँ तक कि) यह संसार, यह शरीर और मन अन्धविश्वास है। तुम हो कितने असीम आत्मा! और टिमटिमाते हुए तारों से छले जाना! यह लज्जास्पद दशा है। तुम दिव्य हो; टिमटिमाते हुए तारों का अस्तित्व तो तुम्हारे कारण है।

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