मूछोंवाली - मधुकान्त Muchhonwali - Hindi book by - Madhukant
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मूछोंवाली

मधुकान्त


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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :149 पुस्तक क्रमांक : 9835

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‘मूंछोंवाली’ में वर्तमान से दो दशक पूर्व तथा दो दशक बाद के 40 वर्ष के कालखण्ड में महिलाओं में होने वाले परिवर्तन को प्रतिबिंबित करती हैं ये लघुकथाएं।

‘मूंछोंवाली’ में वर्तमान से दो दशक पूर्व घरके ड्राईंगरूम में सजी-धजी नारी चारदीवारी में कैद रहती थी तब उसका स्वरूप घूंघट में बंद था। पुस्तक के प्रथम भाग में घूंघटवाली नारी को चित्रित करने वाली लघुकथाएं हैं। आज की नारी घर की चारदीवारी में कैद शोकेश से बाहर निकलकर, घूंघट को छोड़कर दुनिया को खुली आंखों से निहारने लगी हैं। वह अपनी स्मिता को पहचान कर आर्थिक रूप से स्वावलम्बी बन, अपने पांवों पर खड़ी हो गयी है अर्थात् वह हौसलेवाली बन गयी है। पुस्तक के दूसरे भाग में वर्तमान समय में ‘हौसलेवाली’नारी की लघुकथाएं हैं। भविष्य में दो दशक बाद नारी अपने अधिकारों और अपनी शक्ति के प्रति इतनी सचेत हो जाएगी कि स्वाभिमान में चूर अपनी मूंछों पर ऐंठन लगाने लगेगी। रानी लक्ष्मीबाई की भांति शौर्य से भरपूर अपनी मूंछों पर ताव चढ़ाकर दुश्मनों के साथ भिड़ जाएगी। तब वह बिना मूंछों के भी मूंछोंवाली बलशाली लगेगी। पुस्तक के तीसरे व अंतिम भाग में नारी के शौर्य व स्वावलम्बी होने की लघुकथाएं हैं इसलिए इस भाग का नाम ‘मूंछोंवाली’ रखा है।

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