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देवकांता संतति भाग 3

वेद प्रकाश शर्मा

प्रकाशक : राजा पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 1997
पृष्ठ :348
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 2054

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चंद्रकांता संतति के आधार पर लिखा गया विकास विजय सीरीज का उपन्यास...

 

पहला बयान


आज हम अपने प्रिय पाठकों को भरतपुर की राजधानी से कोई बीस कोस एक जंगल में ले जाते हैं। यह पहले ही बता देना हमारा फर्ज है कि यह स्थान भी भरतपुर की सीमा में ही आता है अर्थात् यहां भी राजा सुरेंद्रसिंह का ही राज्य है। चारों ओर घना और खतरनाक जंगल है, इस जंगल में बड़े-बड़े खतरनाक जानवरों का बसेरा है। जंगल की प्रारम्भिक सीमा पर एक छोटा-सा कच्चा मकान है। यह मकान कोई पचास गज का स्थान घेरे हुए है, उसमें चार छोटे कमरे और एक बड़ी टुकड़िया है। इस मकान के मालिक का नाम द्वारकासिंह और उसकी पत्नी का नाम धर्मवती है। दुर्भाग्य की बात है कि ये दोनों ही पति-पत्नी अन्धे हैं। इन दोनों अंधे बूढ़ों का सहारा इनका लड़का है, जिसका नाम देवसिंह है। इस इलाके में यह मकान बिल्कुल अकेला है। हमारे पास यहां की स्थिति अथवा द्वारकासिंह, धर्मवती और देवसिंह के बारे में और अधिक कुछ बताने का समय नहीं है अब हम केवल वही लिखेंगे, जो इस समय हम देख रहे हैं। मकान के एक छोटे कमरे में एक चिराग टिमटिमा रहा है। इस चिराग का क्षीण-सा प्रकाश कमरे की खिड़की से कूदकर बाहर चौक में पड़ रहा है। आइए, चलकर उसी कमरे का हाल देखते हैं।

इस समय पूर्णमासी की रात्रि का अन्तिम पहर चल रहा है।

जंगल में चारों ओर चांदनी का साम्राज्य है। आकाश पर गोल चन्द्रदेव आज अपनी विजय पर मुस्करा रहे हैं। खैर, छोड़िये इन सब बातों को आइए हम उस कमरे में चलकर एक विचित्र एवं अनूठे व्यक्ति से मिलते हैं। कमरे में एक तरफ एक ढीली-ढाली-सी खाट पड़ी है। अदवायन न कसी जाने के कारण खाट खटोला हो गई है। बान टूटकर धरती पर लटक रहे हैं। देवसिंह उसी चारपाई पर लेटा हुआ है, बल्कि यूं कहना चाहिए कि इस समय देवसिंह गहरी नींद में सोया हुआ है। कमरे में हाथ की बनी हुई कई तस्वीरें रखी हुई हैं। एक खिड़की में रंग और कूची तथा आर्ट कागज बिखरे पड़े हैं। अब हमारे पाठक जरा ध्यान से पढें, क्योंकि हम एक बहुत ही अनूठी बात लिखने जा रहे हैं। पाठकगण समझने का प्रयास करें कि हम क्या कहना चाहते हैं? वो देखो... सोता हुआ देवसिंह क्या देख रहा है? एक विशाल राजमहल... वह इस राजमहल को पहचानता है। यह भरतपुर का राजमहल है। सोता हुआ देवसिंह भरतपुर की राजधानी में स्थित इस राजमहल को देख रहा है। चांदनी के प्रकाश में यह राजमहल बेहद आकर्षक लग रहा है। देवसिंह की दृष्टि एक बारादरी में पड़ती है। राजमहल की बारादरी में से इस समय एक आदमी गुजर रहा है। इस आदमी के चलने का ढंग ऐसा है, जैसे वह कोई चोर हो और उसे किसी के द्वारा अपने देख लिए जाने का खतरा हो। चोरों की भांति चारों ओर सतर्क दृष्टि डालता हुआ वह दबे पांव बारादरी में एक तरफ को बढ़ रहा है, मगर वह उसे पहचानता नहीं है। देवसिंह देख रहा है कि अभी तक उस आदमी पर किसी की नजर नहीं पड़ी है। तह चुपचाप खुद को सबकी नजरों से छुपाता हुआ आगे बढ़ रहा है।

सोते हुए देवसिंह की दृष्टि प्रत्येक पल उसी पर जमी हुई है। थोड़ी देर बाद वह राजमहल की बारादरी में बने हुए एक कमरे में दाखिल हो जाता है। उस कमरे की छत में एक खूबसूरत कंदील जल रहा है। कंदील के प्रकाश में देवसिंह को कमरे का दृश्य बिल्कुल स्पष्ट नजर आ रहा है। एक खूबसूरत पलंग पर गहरी नींद में एक औरत सोई हुई है। वह आदमी एक सायत (क्षण) के लिए कमरे के दरवाजे पर रुकता है और अपने कपड़ों में से एक चमकदार चाकू निकाल लेता है। चाकू निकालते ही उस आदमी का चेहरा लाल सुर्ख हो जाता है आखें दहकने लगती हैं। वह पंजों के बल चलता हुआ पलंग की तरफ बढ़ता है। पलंग पर सोई हुई औरत को इस आदमी की उपस्थिति का आभास तक नहीं है। वह तो आराम से अपने बिस्तर पर सोई हुई है। ऐसा प्रतीत होता है? जैसे वह कोई स्वर्ण स्वप्न देख रही है, तभी तो उसके गुलाबी होंठों पर हल्की-हल्की मुस्कान है। देवसिंह के देखते-ही-देखते वह आदमी अपने हाथ में नंगा चाकू लिए पलंग के समीप पहुंच जाता है। एकाएक वह आदमी बिस्तर पर सोई औरत को जगा देता है!

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