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उपन्यास >> नास्तिक

नास्तिक

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :433
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 7596

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खुद को आस्तिक समझने वाले कितने नास्तिक हैं यह इस उपन्यास में बड़े ही रोचक ढंग से दर्शाया गया है...

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उमाशंकर ने घर पहुँच माता-पिता को बताया, ‘‘मैं प्रज्ञा और उसके घर के सब प्राणियों को रविवार के दिन मध्याह्न के भोजन का निमन्त्रण दे आया हूँ।’’

माता-पिता ड्राइंगरूम में बैठे उमाशंकर की प्रतीक्षा कर रहे थे। वे जातने थे कि पुत्र प्रज्ञा के सुलह कराने का यत्न कर रहा है। परन्तु पिता का यह अभिप्राय नहीं था कि लड़की और विशेष रूप में लड़की की ननद पुनः उनके घर में आ उससे युक्ति-प्रतियुक्ति करने लगे। इस कारण उसने उमाशंकर से पूछ लिया, ‘‘वहाँ इतनी देर क्या करते रहे हो?’’

‘‘आज प्रातः जीजाजी के घर उनके अब्बाजान और उनकी दूसरी बेगम बम्बई से आये थे। वे लड़की कमला को अपने साथ ले जाना चाहते थे। लड़की ने इनकार कर दिया तो वह जेब से रिवाल्वर निकाल गोली चलाने लगे। पिता-पुत्र में हाथापाई हो गयी। दो गोलियाँ चलीं, परन्तु कोई घायल नहीं हुआ। हाथापाई से निशाना ठीक नहीं बना सका।’’

‘‘मैं इस पूर्ण घटना का वृत्तान्त सुन रहा था। इसी के सुनने में वहाँ देर लगा गई है।’’

‘‘तुम जो कुछ कहने गए थे, उससे कुछ अधिक कर आये हो और मैं समझता हूँ कि गलत कर आए हो।’’

‘‘पिताजी! मैं माताजी का यही अभिप्राय समझा था। क्यों माताजी! आपका क्या मतलब था?’’

‘‘मतलब तो यह नहीं था, परन्तु अब तुम निमन्त्रण दे आये हो तो उस दिन मध्याह्न के भोजन का विशेष ‘मीनो’ विचार करना पड़ेगा।’’

‘‘परन्तु तुमने मुझसे पूछ कर कुछ किया नहीं और न ही यह निमंत्रण मुझसे पूछ कर दिया है। इस कारण मैं उस दिन भोजन घर से बाहर लूँगा।’

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