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उपन्यास >> नास्तिक

नास्तिक

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :433
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 7596

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खुद को आस्तिक समझने वाले कितने नास्तिक हैं यह इस उपन्यास में बड़े ही रोचक ढंग से दर्शाया गया है...

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ज्ञानस्वरूप और कमला दोनों के पृथक्-पृथक् जवाबदावे तैयार किए गए और अदालत में उपस्थित कर दिए गए।

मुहम्मद यासीन उर्फ ज्ञानस्वरूप ने अपने बयान में कहा, ‘‘मैंने अपना नाम बदल लिया है। यह इस कारण कि मुहम्मद यासीन अरबी-भाषा का नाम है। अरब मुझे अपने देश का नागरिक नहीं मानता। इस कारण उनकी भाषा में नाम रखने में मुझे कोई कारण समझ नहीं आया।’’

‘‘मैं हिन्दू नहीं हूँ। हिन्दू कोई मत नहीं है। पेड़-पौधों को परमात्मा की भांति पूजने वाले से लेकर निराकार परमात्मा को पूजने वाले तक सब हिन्दू कहाते हैं। साथ ही आज के हिन्दू प्रायः नास्तिक हैं और मैं परमात्मा के अस्तित्व को मानता हूँ। इस कारण मैं हिन्दू नहीं हूँ।’’

‘‘मैंने अपना नाम संस्कृत भाषा में रखा है, इसलिये नहीं कि मैं हिन्दू हूँ। संस्कृत विशेष रूप से वैदिक संस्कृत, जिस भाषा में मेरे नाम के शब्द ज्ञान और स्वरूप हैं, वह प्रायः सब इण्डो-यूरोपियन भाषाओं की जननी है। यह हिन्दुओं की बपौती नहीं है। इस कारण मेरा नाम हिन्दू नहीं है। यह वैदिक भाषा का नाम है। इसका किसी मत-मतान्तर से सम्बन्ध नहीं।’’

‘‘हाँ! मैं मुसलमान नहीं रहा। क्यों? यह मैं इस अदालत में नहीं बताऊँगा। मैं इस अदालत को इस विषय पर जाँच-पड़ताल करने योग्य नहीं मानता।’’

‘‘मेरा विवाह एक हिन्दू मत को मानने वाले की लड़की से हुआ है, मगर मेरा विवाह सिविल-मैरिज-एक्ट के मुताबिक हुआ है।’’

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