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उपन्यास >> नास्तिक

नास्तिक

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :433
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 7596

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खुद को आस्तिक समझने वाले कितने नास्तिक हैं यह इस उपन्यास में बड़े ही रोचक ढंग से दर्शाया गया है...


‘‘कल तो तुम केवल बाजा ही बजा रही थीं। मुझे पसन्द नहीं आया। आज इस बजाने के साथ तुम गा रही थीं और मैं तो हैरान इस बात पर हुई कि तुम्हारी आवाज बहुत मीठी है। मुझे तो वीणा दूसरे बाजों से भी ज्यादा मीठी मालूम हुई है।’’

‘‘अम्मी! कलाकंद की तरह मीठी थी या किसी और मिठाई की तरह?’’

इस सवाल पर सालिहा सोचने लगी। फिर बोली, ‘‘मिठाई तो जबान को लजीज मालूम होती है। मगर यह मिठास कानों को मालूम पड़ी है।’’

‘‘इसे स्वर की माधुरी कहते हैं।’’

‘‘क्या मतलब?’’ सालिहा का प्रश्न था।

‘‘अम्मी! आवाज की मिठास को स्वर-माधुरी कहते हैं।’’

‘‘देखो नगीना...।’’

कमला ने बात बीच में ही रोककर कहा, ‘‘अम्मी! नगीना नहीं, मेरा नाम अब कमला है।’’

‘‘यही तो मुझे समझ नहीं आ रहा कि यह नाम क्यों बदला है?’’

‘‘यह इसलिए कि हमने अपनी तहज़ीब बदल दी है। हम तहज़ीब को सभ्यता कहते हैं। मेरे वीणा के मास्टर कहते हैं कि यह हिन्दू तहज़ीब है। वह कह रहे थे कि वीणा बजाना भी हिन्दू तहज़ीब की पैदावार है। हिन्दुओं की एक देवी है जिसे कला की देवी कहते हैं। बड़ी अम्मी ने उसी देवी का नाम रख लिया है सरस्वती। उसका एक नाम वीणा-पाणि भी है। मतलब यह कि वह देवी जिसके हाथ में वीणा है।’’

‘‘तो तुम हिन्दू हो गई हो?’’

‘‘यह अभी फैसला नहीं किया। इन बातों के साथ हिन्दू का कोई ताल्लुक नहीं। यह विचित्र वीणा तो एक मुसलमान रहमान अली भी बहुत अच्छी बजाते हैं। उसके वीणा के ग्रामोफोन रिकार्ड भी बिकते हैं। इस पर भी यह बाजा हिन्दुओं की देवी सरस्वती का कहा जाता है।’’

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