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उपन्यास >> नास्तिक

नास्तिक

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :433
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 7596

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खुद को आस्तिक समझने वाले कितने नास्तिक हैं यह इस उपन्यास में बड़े ही रोचक ढंग से दर्शाया गया है...


‘‘तुम दोनों मूर्ख हो!’’

‘‘तो पिताजी! ऐसा करिये, हम मूर्खों को परस्पर निपटने दीजिये और आप हमारी भाँति मूर्ख मत बनिये।’’

‘‘मगर यह तो मुझसे दुकान के लिए पूँजी माँगने आया है?’’

‘‘यदि आप दे सकें तो उचित ही है।’’

उमाशंकर को ऐसी बातें करते देख रविशंकर बोल उठा, ‘‘तो जाओ जहन्नुम में। मैं इसकी, तुम्हें पराजित करने में सहायता करूँगा। तुम बड़े गधे हो। यद्यपि गधा तो यह शिव भी है, परन्तु तुम उससे बड़े हो। मैं कमला को इसका घर बसाने में सहायता करूँगा। अभी तक तुम्हारे लिए आने वाले रिश्तों को मैं लारे-लप्पे लगा रहा था। अब मैं उनको साफ उत्तर दूँगा और कह दूँगा कि तुम महामूर्ख हो, मैं तुम्हारी शादी में बैठूँगा भी नहीं।’’

पिता को आज कई दिन के उपरान्त फिर नाराज होते देख उमाशंकर मौन हो गया। परन्तु महादेवी ने कह दिया, ‘‘यदि आप खुलकर शिव की उमा के खिलाफ सहायता करेंगे तो मैं उमा की शिव के खिलाफ सहायता करूँगी।’’

‘‘मैं तुमसे भी लड़ पड़ूँगा?’’

‘‘यह तो स्वाभाविक ही है। परमात्मा को न मानने वाला यही कर सकता है, जो आप कह रहे हैं।’’

‘‘यह तुम हर बात में परमात्मा को ले आती हो? पूर्ण आयु-भर हनुमानजी की पूजा करता रहा हूँ और तुम मुझे नास्तिक कहती हो। मैं ईश्वर-भक्त को अपना गुरु पीर मानता रहा हूँ और तुम न कभी संध्या-उपासना करती हो, न किसी मन्दिर में नमस्कार करने जाती हो और परमात्मा की ठेकेदार बन गई हो।’’

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