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उपन्यास >> नास्तिक

नास्तिक

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :433
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 7596

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खुद को आस्तिक समझने वाले कितने नास्तिक हैं यह इस उपन्यास में बड़े ही रोचक ढंग से दर्शाया गया है...


कमला बोली, ‘‘कल प्रातःकाल पता चल जाएगा। मगर कुछ पता न चला तो पुलिस में रिपोर्ट लिखा देंगे।’’

इसकी अवश्यकता नहीं पड़ी। रात के दस बजे टेलीफोन खड़का। अब्दुल हमीद इम्पीरियल होटल से बोल रहा था। प्रज्ञा ने टेलीफोन सुना तो ज्ञानस्वरूप को कह दिया, ‘‘आपके अब्बाजान का टेलीफोन है। इम्पीरियल से बोल रहे हैं और आपसे बात करना चाहते हैं।’’

इस वक्त तक सब वहीं ड्राइंगरूम में बैठे इधर-उधर की बातें कर रहे थे।

ज्ञानस्वरूप ने फोन ले सलाम-आलेकुम कही ही थी कि उधर से गालियों की बौछार आने लगी। ज्ञानस्वरूप चुपचाप सुनता रहा। उधर से तीन मिनट तक उसके अब्बाजान कहते रहे और वह चुपचाप सुनता रहा। अन्य दोनों प्राणी उत्सुकता से ज्ञानस्वरूप के मुख पर देख रहे थे। ज्ञानस्वरूप गम्भीर मुख बनाये टेलीफोन सुन रहा था।

आखिर ज्ञानस्वरूप बोला, ‘‘अब्बाजान! और कुछ?’’

फिर आधा मिनट तक लगातार कुछ कहा गया और टेलीफोन बन्द हो गया।

ज्ञानस्वरूप ने टेलीफोन का चोंगा रखा और अपनी अम्मी को बताने लगा, ‘‘छोटी अम्मी उनके पास पहुँच गई हैं। अब्बाजान दिल्ली में तीन-चार दिन से हैं और कुछ हमारे खिलाफ साज़िश कर रहे हैं।’’

‘‘तो मेरा ख्याल ठीक है कि सालिही भगाई नहीं गई, बल्कि भाग गई है और इस घर के खिलाफ साजिश करनेवालों से जा मिली है।’’

एकाएक ज्ञानस्वरूप को उमाशंकर की याद आई और उसने कोठी का नम्बर घुमा दिया।

टेलीफोन पर रविशंकर आया। ज्ञानस्वरूप ने उमाशंकर से बात करने के लिए बुलाया तो उमाशंकर आ गया।

ज्ञानस्वरूप ने वहाँ की पूरी बात बताई तो उमासंकर ने कहा, ‘‘मैं थाने में टेलीफोन करता हूं। आजकल यहाँ का थानेदार मेरा मरीज है और मैं समझता हूँ कि वह हमारी मदद करेगा।’’

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