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उपन्यास >> बनवासी

बनवासी

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :253
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 7597

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नई शैली और सर्वथा अछूता नया कथानक, रोमांच तथा रोमांस से भरपूर प्रेम-प्रसंग पर आधारित...


इन दिनों धनिक और सोना को एकान्त में बैठकर बातचीत करने का मौका मिला। दोनों एक दिन नदीं के किनारे बैठे थे। सोना ने कहा, ‘‘यदि तुम लुमडिंग से न आते तो तुम्हारे साथ वह दुर्घटना न होती।’’

‘‘मैं वहाँ रहता तो अवश्य तुम्हारी हत्या कर देता और फिर मुझको भी फाँसी चढ़ा दिया जाता। अब जीवित तो हूँ।’’

‘‘मुझे विश्वास था कि मैं तुम्हें समझाती तो तुम मेरी हत्या का विचार छोड़ देते।’’

‘‘क्या समझातीं तुम? सब कुछ तो मैं जान गया था, और क्या बता सकती थीं तुम?’’

‘‘जानने की बात तो कुछ नहीं थी, परन्तु समझने की बात तो थी। मेरा बड़े साहब से सम्बन्ध था और मैं अपने देवताओं के राज्य से बाहर दूसरे देवताओं के राज्य में थी, उन देवताओं का आदेश था कि बड़े साहब मेरे पति हैं।’’

‘‘तुम झूठ कहती हो।’’

‘‘नहीं, सत्य कहती हूँ। मुझे बार-बार वे स्वप्न में आकर बताते थे और मेरे मन के संशय दूर हो रहे थे। जब मुझे पंचायत के हाथ में देने के लिए सरकारी सचिव के शिविर में लाया गया तो मुझे विश्वास था कि अपने अधिकार में लेते ही पंचायत मुझे मार डालेगी। मैंने वहाँ के देवताओं का चिन्तन किया तो मुझे विदित हुआ कि पंचायत और उसके साथ सहस्त्रों नाग जाति के लोग मरे पड़े हैं। वे मुझे मारना तो दूर, प्रत्युत छू भी नहीं सकते। इससे निर्भीक हो, मैं वहाँ गई और स्वयं को पंचायत के हाथ में देने के लिए कह दिया।’’

‘‘फिर भी अपने देवता तुमको दण्ड दिए बिना नहीं छोड़ेंगे। मुझे तो वे अपना साधन नहीं बना सकते। हाँ, यह निश्चित जानो कि तुम्हारे पाप का दण्ड दिए बिना वे तुम्हें छोड़ेंगे नहीं।’’

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