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उपन्यास >> बनवासी

बनवासी

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :253
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 7597

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नई शैली और सर्वथा अछूता नया कथानक, रोमांच तथा रोमांस से भरपूर प्रेम-प्रसंग पर आधारित...


आने वाला पादरी हँस पड़ा और बोला, ‘‘बताओ, सामान कहाँ पर रखवाना है?’’

वह बड़ौज को उसी मकान में ले गया जहाँ से स्वयं आया था। आगे-आगे स्थानीय पादरी था। पीछे-पीछे बड़ौज सामान उठाए हुए। उसके पीछे बाहर से आने वाला पादरी।

एक सुसज्जित कमरे में सामान रखा गया, बड़ौज ने सलाम किया और वह बाहर को चल पड़ा। वह मकान की सीढ़ियाँ उतर रहा था कि उसे कमरे में दोनों पादरियों के हँसने का शब्द सुनाई दिया।

बड़ौज पादरी से नौकरी के विषय में कहना चाहता था, परन्तु स्थानीय पादरी की त्यौरियाँ देखकर वह चुप ही रहा। फिर किसी दिन बात करने के विचार से वह वहाँ से चल पड़ा।

बरामदे से निकल गिरजाघर के बाहर खुले मैदान में गुज़रता हुआ वह फाटक की ओर जा रहा था कि उसको पीछे से आवाज़ सुनाई दी, ‘‘कुली! कुली!’’

बड़ौज ने घूमकर देखा स्थानीय पादरी अपने हाथ के संकेत से उसको वापस बुला रहा था। वह लौट पड़ा।

जब वह बरामदे में खड़े पादरियों के समीप पहुँचा तो स्थानीय पादरी ने पूछा, ‘‘क्या मज़दूरी चाहिए?’’

‘‘कुछ नहीं, फादर!’’

‘‘क्यों?’’

‘‘फादर के पास देने के लिए पैसा नहीं है।’’

‘‘तुम ईसाई हो?’’

‘‘हाँ।’’

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