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उपन्यास >> बनवासी

बनवासी

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :253
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 7597

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नई शैली और सर्वथा अछूता नया कथानक, रोमांच तथा रोमांस से भरपूर प्रेम-प्रसंग पर आधारित...


बिन्दू ने उस आगन्तुक को बिठाकर पूछा, ‘‘आप कहाँ से आए हैं?’’

बड़ौज ने इस ढ़ग से परिचय देना चाहा जिससे न तो उसे झूठ बोलना पड़े और न ही बिन्दू उसको पहचान सके। उसने बताया, ‘‘मैं बिज़नेसमैन हूँ। मेरा कारोबार कलकत्ता, पटना, गोहाटी, शिलांग में है। इस वर्ष काम से पंजाब में आया था तो किसी ने इस स्थान के सौन्दर्य और ग्लेशियर के दृश्य की बहुत प्रशंसा की। अतः यहाँ आ पहुँचा हूँ। इस समय इधर कोई आता नहीं। बहुत कठिनाई से तो कुली मिला और फिर डाकबंगले का चौकीदार नहीं था। ताला तोड़कर उसमें ठहर गया हूँ।

‘‘मैं मिस्टर स्टीवनसन से मिलना चाहता था। जस्ट फॉर दि सेक ऑफ सिविलाइज़्ड कम्पनी?’’

‘‘कितने दिन ठहरने का विचार है?’’

‘‘एक सप्ताह तो रहूँगा ही।’’

‘‘यह तो बहुत अच्छा रहेगा।’’

इस समय बिन्दू की नौकरानी आई और उसको चाय बनाने के लिए कह दिया गया। जब वह चली गई तो बिन्दू ने पूछ लिया, ‘‘आपका शुभ नाम क्या है?’’

‘‘बी. जी. बिलमौर।’’

‘‘आप तो हिन्दुस्तानी प्रतीत होते हैं?’’

‘‘हाँ, मेरा नाम बिधि गिरीश और बिलमौर मेरा ईसाई होने का नाम है।’’

‘‘तो आप ईसाई हैं?’’

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