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उपन्यास >> बनवासी

बनवासी

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :253
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 7597

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नई शैली और सर्वथा अछूता नया कथानक, रोमांच तथा रोमांस से भरपूर प्रेम-प्रसंग पर आधारित...


‘‘आप कभी कलकत्ता, पटना, गोहाटी इत्यादि स्थानों पर गए हैं?’’

‘‘कलकत्ता तो कई बार गया हूँ।’’

‘‘तो फिर वहीं भेट हुई होगी।’’

बात समाप्त हो गई। इस समय नौकरानी चाय लेकर आ गई। स्टीवनसन ने कहा, ‘‘आज का दिन बहुत अच्छा प्रतीत हो रहा है। यदि आपको स्केटिंग का शौक हो तो हम आपको स्केट्स दे सकते हैं और बहुत मज़ा रहेगा।’’

‘‘मुझे भी प्रसन्नता होगी और मैं आपका आभारी रहूँगा।’’

‘‘आपके भोजन का क्या प्रबन्ध है?’’

‘‘उन झोंपड़ियों में से आटा, दाल, चालव, अण्डे, मुर्गी इत्यादि कुली ले आया था, वह बना रहा होगा।’’

‘‘डाकबंगले का खाना नहीं खाया?’’

‘‘वहाँ कोई है ही नहीं। मैं तो ताला तोड़कर वहाँ पर घुस बैठा हूँ।’’

‘‘ठीक किया है। रहीम, मेरा मतलब है, वहाँ का खानसामा अपनी प्रेमिका से मिलने के लिए कुल्लू गया होगा। आएगा तो उसको यहाँ भेज दीजिएगा, हम उसे समझा देंगे।’’

बिन्दू ने कहा, ‘‘आप अपना खाना उठवाकर यहाँ ले आइएगा, यहाँ एक साथ बैठकर खाएँगे और अभी एक घण्टे में स्केटिंग के लिए चलेंगे।’’

‘‘मैंने कभी स्केटिंग की नहीं। आशा है, आप मेरे भद्दे खेल पर अच्छी प्रकार हँस पाएँगे।’’

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