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उपन्यास >> सुमति

सुमति

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :265
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 7598

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बुद्धि ऐसा यंत्र है जो मनुष्य को उन समस्याओं को सुलझाने के लिए मिला है, जिनमें प्रमाण और अनुभव नहीं होता।


नलिनी को अपने बच्चे में सर्वथा अवकाश रहता था अतः वह अपना समय सुदर्शन की माता की सेवा-टहल, सुदर्शन के छोटे-मोटे काम और निष्ठा से संगीत सीखने में व्यतीत किया करती थीं।

श्रीपति और उसकी पत्नी कात्यायिनी नलिनी से मिलने आया करते थे। पहली बार तो वे डरते-डरते आए थे। उनका विचार था कि नलिनी सुदर्शन के घर पर भी उनको जली-कटी सुनाने लगेगी। इसी कारण वे उस समय आए थे जब सुदर्शन घर पर था। रविवार का दिन था और पूर्ण परिवार के सामने ही नलिनी से भेंट हुई। नलिनी शान्त थी।

सुख-समाचार पूछा गया तो नलिनी ने सभ्यतापूर्वक ही उत्तर दिया। इसके उपरान्त वे प्रायः प्रति रविवार आने लगे। अब तो वे अपने बच्चों को भी साथ ले आते थे। इस प्रकार दोनों परिवारों का सम्बन्ध और अधिक घनिष्ठ होता गया।

इस नए सम्बन्ध की बात कॉलेज में आए सहयोगियों को पता चल गई। कॉलेज के कुछ मित्र सुदर्शन के घर भी आया करते थे और वे श्रीपति की बहन को उसके घर देख विस्मय करते रह गए। बात ‘स्टाफ-रूम’ में पहुँची तो इसकी प्रतिक्रिया भी हुई। यह सुनने वालों की मानसिक प्रवृत्ति के अनुसार ही हुई। हँसी-हँसी में बात वहाँ चल ही पड़ी। एक मनचले डॉ० सुदर्शन से वयस् और पदवी में बड़े डॉ० दास ने पूछ ही लिया, ‘‘सुदर्शन! श्रीपति की बहन तुम्हारे यहाँ रहती है?’’

‘‘हाँ, डॉक्टर साहब।’’

‘‘भाई यहाँ चर्चा है कि तुम्हारी उससे विवाह के पूर्व भी घनिष्ठता थी?’’

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