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उपन्यास >> सुमति

सुमति

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :265
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 7598

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बुद्धि ऐसा यंत्र है जो मनुष्य को उन समस्याओं को सुलझाने के लिए मिला है, जिनमें प्रमाण और अनुभव नहीं होता।


‘‘सुमति को सन्देह तो हो ही सकता है। वह प्रातःकाल चाय बना उसको जगाने जा पहुँचती हैं।’’

‘‘मैं सुमति से पूछूँगी।’’

‘‘नलिनी के लिए कोई घर-घाट ढूँढ़ना चाहिए।’’

‘‘क्या मतलब?’’

‘‘उसका विवाह-विच्छेद करा लेना चाहिए और उसके भाई की सहमति, सम्मति तथा स्वीकृति से उसके नवीन विवाह की व्यवस्था कर देनी चाहिए।’’

‘‘यह तो सुमति ही उसको कह सकती है। वह उसे इस घर में लाई थी, वही उसके विषय में कोई दूसरा प्रबन्ध कर सकती है। मैं समझती हूँ कि हमें इस विषय में किसी प्रकार की बात नहीं करनी चाहिए।’’

‘‘अच्छा सुमति से बात करना।’’

रात्रि के भोजनोपरान्त सुदर्शन कभी ड्राइंग-रूम में, कभी अपने अध्ययन-कक्ष में नलिनी, निष्ठा और सुमति के साथ एक घंटा बैठा करता था। उस दिन, जिस दिन कल्याणी ने सुमति को कहा था कि अब उसे पृथक् कमरे में सोने की आवश्यकता नहीं रही, नलिनी ने डॉक्टर के स्टडी-रूम में बैठे हुए बात चला दी। निष्ठा शीघ्र ही सोने के लिए चली गई थी। उसकी परीक्षा हो चुकी थी, किन्तु परीक्षा-फल घोषित नहीं हुआ था। निष्ठा इस बात की चिन्ता किए बिना कि परीक्षा का फल कैसा होगा अपनी दिनचर्या में लगी रहती थी। उसी सायंकाल वह एक संगीत-समारोह में भाग लेकर आई थी। उसने दो घण्टे का प्रदर्शन किया था और इससे वह थक गई थी। अतः उसने कहा, ‘‘नलिनी बहन! मैं तो सोने जा रही हूँ।’’

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