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उपन्यास >> सुमति

सुमति

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :265
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 7598

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बुद्धि ऐसा यंत्र है जो मनुष्य को उन समस्याओं को सुलझाने के लिए मिला है, जिनमें प्रमाण और अनुभव नहीं होता।


अब सुमति निश्शंक हो अपने पति के कमरे में जाती, उसका बिस्तर तथा कपड़े आदि ठीक कर देती। यों उसने अपने सोने का कमरा पृथक् ही बना रखा था। बच्चों को नौकरानी के साथ एक अन्य कमरा मिल गया था। रात देर तक वह अपने पति के कमरे में रहती थी। इसका एक परिणाम यह हो गया था कि नलिनी को डॉक्टर के बहुत से कार्मों से अवकाश मिल गया था।

बच्चे के लिए दायी रखे जाने पर भी सुमति को पृथक् कमरे में सोते देख नलिनी में इस स्थिति में डॉ० सुदर्शन से सम्बन्ध घनिष्ठ करने की इच्छा जाग्रत हो पड़ी थी। उसने यत्न भी किया। एक दिन, उक्त वार्तालापों से पूर्व की ही बात है। नलिनी प्रातःकाल डॉ० सुदर्शन के लिए चाय बनाकर देने आयी तो वह चाय बना, डॉक्टर साहब को जगाने लगी। आज वह नित्य से कुछ जल्दी ही आईं थी। इस दिन डॉ० सुदर्शन को जगाने के लिए वह उनके पलंग पर बैठ उनके गाल को हाथ सहलाने लगी। डॉ० सुदर्शन की नींद खुली और उन्होंने नित्य के विपरीत नलिनी के व्यवहार को समझा तो उसका हाथ एक ओर कर उठ बैठा और डाँट के भाव में बोला, ‘‘यह आज क्या हो गया है तुम्हें? उठो, वह कुर्सी लेकर बैठो।’’

‘‘तो आप समझे नहीं कि क्या हो रहा है मेरे दिल में? मैं अपने को उसी अवस्था में अनुभव कर रही हूँ जिसमें आपके सुमति से विवाह के पूर्व थी।’’

सुदर्शन लपककर पलंग से उठ सामने खड़ा हो बोला, ‘‘परन्तु क्या वह अवस्था अब है? देखो नलिनी! उसे स्वप्न समझो। देखो, दो प्राणियों का परस्पर स्नेह कहो अथवा प्रेम कहो, एक बात है और पति-पत्नी सम्बन्ध दूसरी बात है। पहला मन और आत्मा की स्थिति है और दूसरा धर्म की स्थिति है। धर्म सामाजिक व्यवहार को नियंत्रित करता है। प्रेम अथवा स्नेह मन की भावना को। मैं तो स्नेह और प्रेम में अन्तर नहीं मानता। दोनों मन की भावनाएँ है, परन्तु पति-पत्नी सम्बन्ध तो शरीर का है।

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