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उपन्यास >> सुमति

सुमति

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :265
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 7598

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बुद्धि ऐसा यंत्र है जो मनुष्य को उन समस्याओं को सुलझाने के लिए मिला है, जिनमें प्रमाण और अनुभव नहीं होता।


‘‘रही नौकरी की बात। इसके लिए जब तक डॉक्टर साहब यह न कह दें कि वे उसका बोझ सहन नहीं कर सकते, तब तक मैं स्वयं उससे नहीं कहूँगी कि वह कोई नौकरी कर ले।’’

‘‘माँजी! मैं दफ्तरों इत्यादि में स्त्रियों की नौकरी करने को अच्छा नहीं समझती। हाँ, जब कोई अन्य साधन न रहे तो फिर विवशता है।’’

‘‘और यौन-सम्बन्धी भूख का भी हो प्रश्न है।’’

‘‘इसका निर्णय भी तो व्यक्ति को स्वयं ही करना चाहिए। इसका सम्बन्ध मैं किसी की जीविका के साथ जोड़ना उचित नहीं समझती।’’

कल्याणी बात समझ नहीं पाई। उसके मस्तिष्क में तो यही था कि एक स्त्री का जिस पुरुष के साथ यौन-सम्बन्ध हो, उस पुरुष का यह कर्तव्य हो जाता है कि वह उस स्त्री का पालन-पोषण का प्रबन्ध करे। इस कारण उसने सुमति के कथन का अर्थ समझने के लिए पूछा, ‘‘सुमति बेटा! क्या अभिप्राय है तुम्हारे कथन का? क्या तुम यह चाहती हो कि स्त्री का यौन-सम्बन्ध किसी एक पुरुष से हो और उसकी जीविका का प्रबन्ध कोई अन्य करे? साथ ही उसकी सन्तान के पालन-पोषण का भार किसी तीसरे व्यक्ति पर हो? इस प्रकार के प्रबन्ध से तो संसार में भारी दुर्व्यवस्था फैल जावेगी।’’

‘‘दुर्व्यवस्था तो मन की दुर्बलता के कारण फैलती है। जब मन सबल होगा तो सन्तान उत्पन्न करने के स्थान पर ही यौन-सम्बन्ध करने की इच्छा होगी। सन्तान होगी तो उसके पिता को उसके पालन-पोषण का प्रबन्ध भी करना होगा। इसी को गृहस्थाश्रम कहते हैं। जहाँ मन इतना दुर्बल है कि यौन-सम्बन्ध सन्तान की इच्छा के बिना बन जाता है वहाँ मेरी सम्मति है कि उनको सन्तान-निरोध के उपाय बरतने चाहिए। यौन-क्रिया और गृहस्थाश्रम साथ-साथ चलने चाहिए। जहाँ वे नहीं चल सकते वहाँ सन्तति-निरोध कर लेना चाहिए। परन्तु यौन-सम्बन्ध के लिए स्त्री को कुछ मिलना और पुरुष का कुछ देना तो वेश्यावृत्ति के समान हो जाएगा। यह तो किसी स्थिति में स्तुव्य नहीं है।

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