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उपन्यास >> सुमति

सुमति

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :265
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 7598

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बुद्धि ऐसा यंत्र है जो मनुष्य को उन समस्याओं को सुलझाने के लिए मिला है, जिनमें प्रमाण और अनुभव नहीं होता।


‘‘मैं तो कॉलेज जा रहा हूँ। मोटर न होती तो बस, टैक्सी अथवा स्कूटर में जाता। वास्तव में पूछने की बात तो सुमति से है कि वह आज उस ओर किसलिए जा रही है।’’

‘‘तो भाभी ने आपको बताया नहीं?’’

‘‘यह आवश्यक नहीं कि वह अपने सब कार्मों के विषय में मुझको सूचना देती रहे। आज इसने कहा कि यह उधर ही जा रही है, तो हम साथ-साथ चलने लगे। मैंने कहा यदि तुम भी उसी ओर जा रही हो तो तुमको भी सवारी मिल सकती है, सो मिल गई है।’’

इससे नलिनी ने यही अनुमान लगाया कि या तो वास्तव में पति पत्नी के आवागमन पर प्रतिबन्ध लगाना नहीं चाहता, यहाँ तक कि वह पूछता भी नहीं चाहता कि वह किधर जा रही है। अथवा वह सब कुछ जानता है और बताना नहीं चाहता। इस कारण उसने कुछ पूछने की बजाय अपनी बात बताते हुए कहा, ‘‘मैं तो एक सप्ताह से नित्य यहाँ जा रही हूँ।’’

‘‘क्यों, क्या काम है वहाँ?’’

‘‘वहाँ मुझे एक नौकरी मिल गई है।’’

‘‘सत्य?’’ साश्चर्य सुमति ने पूछा।

‘‘हाँ, मैं सोच रही थी कि प्रथम वेतन मिलने पर ही आप लोगों को बताऊँगी, अभी तो मैं पूर्णरूपेण आप लोगों के आश्रित पल रही हूँ।’’

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