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उपन्यास >> सुमति

सुमति

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :265
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 7598

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बुद्धि ऐसा यंत्र है जो मनुष्य को उन समस्याओं को सुलझाने के लिए मिला है, जिनमें प्रमाण और अनुभव नहीं होता।


‘‘भाभी! जब यह ब्रह्म ही सब कुछ है तब तो बात सिद्ध हो गई कि मैं तुम और सब कोई ब्रह्म ही हैं।’’

‘‘हाँ, यह ठीक है। परन्तु ब्रह्म तीन प्रकार के हैं। ‘त्रिविधं ब्रह्ममेतत्’ ऐसा भी उपनिषद् में कहा है। ऐसा भी कहा है, ‘त्रयं यदाविन्दते ब्रह्ममेतत्।’ यहाँ ब्रह्म का अर्थ परमात्मा नहीं, वरन् तीन महान् अक्षर पदार्थ हैं। इन तीनों को भलिभाँति जान लेने से सब कुछ जाना जा सकता है।’’

इस पर निष्ठा ने अपने मन में बार-बार उठने वाली बात को पूछ लिया,

तो भाभी! यदि इन तीनों को जान लिया जाए तो फिर विवाह की आवश्यकता नहीं रहती न?’’

सुमति एकाएक इस प्रश्न के उत्पन्न होने से आश्चर्यचकित ननद का मुख देखती रह गई। उसने कुछ देर तक निष्ठा के मुख पर देखा और उसके इस प्रश्न के पीछे मन की बात जानने के लिए पूछ लिया, ‘‘भला आज के इस पाठ से विवाह की बात कहाँ से निकल आई?’’

‘‘भाभी!’’ निष्ठा ने रात-भर विचार की हुई बात बता दी। उसने कहा ‘‘मनुष्य जो कुछ भी करता है वह किसी की खोज में करता है। नलिनी बहन ने नया घर बना लिया है तो किसी वस्तु की खोज में ही तो बनाया होगा। इसी कारण पूछ रही हूँ कि जब ब्रह्म विदाप्नोति परम्’ कहा है तो विवाह भी इस कारण व्यर्थ हो जाएगा न?’’

‘‘हाँ। परन्तु विवाह का विषय जानने के उपरान्त ही तो।’’

‘‘तो विचार करके भी ब्रह्म जाना जाता है?’’

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