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उपन्यास >> सुमति

सुमति

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :265
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 7598

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बुद्धि ऐसा यंत्र है जो मनुष्य को उन समस्याओं को सुलझाने के लिए मिला है, जिनमें प्रमाण और अनुभव नहीं होता।


‘‘भाभी! एक बात पूँछू?’’

‘‘हाँ, पूछो।’’

‘‘विवाह किसको कहते हैं?’’

‘‘विवाह स्वयं में तो एक रीति-रिवाज का मात्र पालन करना है। वास्तव में यह कर्तव्यों के समूह का नाम है। समाज ने उन कर्तव्यों को विवाह नाम दिया है। इन कर्तव्यों में कुछ तो ऐसे हैं जिनका मनुष्य के शरीर, प्रकृति और प्रवृत्ति से सम्बन्ध रखते हैं। कुछ समाज का ऋण उतराने के लिए हैं और कुछ अपने परिवार से सम्बन्ध रखते हैं।

‘‘उन कर्तव्यों का पालन न करने से जीवन में और समाज में तथा परिवार में कई प्रकार के अभाव उत्पन्न हो जाते हैं। वे अभाव घातक भी सिद्ध हो सकते हैं।’’

निष्ठा ने गम्भीर हो फिर स्वर भरना आरम्भ कर दिया। उसने गीत का अगला पद गाया -

रहती ज्यों रजनी धीरज धर,
अपलक तारक दीप जगाकर,
त्यों ही यह मेरा तन-मन भी तुमको सतत मनाएगा।
प्रिय मत बोलो तुम!


कुछ देर तक गीत चलता रहा। बीच-बीच में तानालाप भी हुए। सुमति देख रही थी कि ज्यों-ज्यों गीत बढ़ता जाता है निष्ठा के स्वर में अस्थिरता और चंचलता आती जाती है। आज उसने पूर्वापेक्षा आधा घण्टा पूर्व अभ्यास समाप्त कर दिया और मौन-भाव से सरस्वती की प्रतिमा के सम्मुख नतशिर बैठी रही।

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