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उपन्यास >> सुमति

सुमति

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :265
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 7598

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बुद्धि ऐसा यंत्र है जो मनुष्य को उन समस्याओं को सुलझाने के लिए मिला है, जिनमें प्रमाण और अनुभव नहीं होता।


‘‘देखो, नलिनी ने एक बार नहीं अनेक बार यही भूल की है। वह यूनिवर्सिटी की शिक्षा प्राप्त कर अपने को सर्वगुणसम्पन्न समझ बैठी और ठोकर पर ठोकर खाती हुई अभी भी वह भटक रही है।’’

‘‘क्या भूल हुई है उससे?’’

सुमति विचार करने लगी थी कि इस कुमारी कन्या को क्या बताए कितना बताए और किस ढंग से बताए। कुछ क्षण विचार करके उसने अपना मार्ग निश्चित कर लिया और कहने लगी, ‘‘एक समय था, जब नलिनी तुम्हारे भैया से प्रेम करती थी। परन्तु प्रेम का अर्थ वह वासना-तृप्ति मानती थी। वासना उभारने के उपायों से वह तुम्हारे भैया का प्रेमोपहार पाना चाहती थी। किन्तु ऐसा वह नहीं कर सकी और तुम्हारे भैया को भी नहीं पा सकी।

‘‘प्रेम को वह वासनातृप्ति का एक रूप ही समझती थी। अतः जहाँ उसकी वासना तृप्ति हुई उसी को प्रेम मान विवाह कर बैठी। वास्तव में विवाह भिन्न वस्तु है। उसका सम्बन्ध कर्तव्यों से है और वासना शरीर की एक आवश्यकता की पूर्ति का नाम है। प्रेम इन दोनों से विलक्षण वस्तु है। दो प्राणियों के मन और आत्मा के समन्वय को प्रेम कहते हैं।’’

‘‘विवाह तो बिना प्रेम के भी हो सकता है और प्रेम बिना वासना-तृप्ति के भी हो सकता है। इन दोनों के अभाव में भी वासना-तृप्ति हो सकती है, किन्तु तीनों का एक ही स्थान पर होना सौभाग्य की बात है।’’

‘‘नलिनी का प्रेम था भैया से। परन्तु उसने प्रेम के अर्थ मिथ्या लगाए और भटक गई। अभी भी वह इसी भ्रमजाल में भटक रही है।’’

‘‘तुम ‘कठोपनिषद्’ पढ़ो, उस पर चिन्तन और मनन करो और जो कठिनाई आए उसके लिए किसी योग्य गुरु का मार्ग-दर्शन प्राप्त करो।’’

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