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उपन्यास >> सुमति

सुमति

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :265
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 7598

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बुद्धि ऐसा यंत्र है जो मनुष्य को उन समस्याओं को सुलझाने के लिए मिला है, जिनमें प्रमाण और अनुभव नहीं होता।


‘‘बीमार नहीं माँ। मैं तो कम-से-कम सौ वर्ष तक जीने का प्रबन्ध कर रही हूँ।’’

निष्ठा की बड़ी बहन उषा ने बम्बई में अपने परिचितों में से एक वर की सूचना भेजी। पत्र में लड़के का तथा उसके परिवार का पूर्ण वृत्तान्त लिखा था।। साथ ही यह भी लिखा था कि लड़का बी० ए० है और अपने पिता की पाँच मिलों के जनरल मैनेजर के स्थान पर कार्य कर रहा है। विवाह होते ही उसका पिता उसको पाँच सहस्त्र वेतन देने लगेगा। इस समय उसको दो सहस्त्र वेतन मिल रहा है। लड़का संसार के मुख्य-मुख्य देशों का भ्रमण कर चुका है और उसे व्यापार का प्रखर ज्ञान है।

लड़के का नाम सौमित्र है। उसके पिता से उषा के पति की बात हुई है। न तो वे किसी प्रकार का दहेज चाहते हैं और न ही पिता की सम्पति में भाग। इस प्रकार अन्त में उसने लिखा, ‘‘मैं समझती हूँ, इससे अच्छा वर मिलना अति कठिन है। निष्ठा यदि चाहे तो वे दिल्ली आ सकते हैं। अन्यथा वह स्वयं कुछ दिन के लिए बम्बई आ जाए।’’

इस प्रस्ताव पर निष्ठा को अपना निर्णयात्मक मत बताना ही पड़ा। उसने अपनी माँ को कह दिया, ‘‘माँ! मुझे उषा बहन के कहने पर किसी प्रकार का सन्देह नहीं है। ये महानुभाव सत्य ही इस भूतल पर देवतास्वरूप हो सकते हैं। परन्तु माँ! मैंने तो आजीवन विवाह न करने का निश्चय कर लिया है।’’

‘‘तो तुम क्या करना चाहती हो?’’

‘‘जो करना चाहती हूँ उसके लिए तैयारी कर रही हूँ।’’

‘‘क्या तैयारी कर रही हो?’’

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