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उपन्यास >> सुमति

सुमति

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :265
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 7598

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बुद्धि ऐसा यंत्र है जो मनुष्य को उन समस्याओं को सुलझाने के लिए मिला है, जिनमें प्रमाण और अनुभव नहीं होता।


‘‘पहले तो आशा ही नहीं है। दूसरे मैंने दिल्ली कोर्ट में तलाक का दावा किया हुआ है। उसको एक वर्ष से अधिक हो गया है। तीसरे ऐसी बात होने से पूर्व ही मैं सेठजी से सब निश्चय करके रखूँगी कि हमें क्या कहना है।’’

‘‘तो ऐसा करेंगे।’’ कल्याणी ने बात बदलकर कहा, ‘‘अभी भोजन का समय हो रहा है। हमारे घर कुछ दिन से एक अतिथि आए हुए हैं। वे भी आज बम्बई जा रहे हैं। भोजन करने आएँगे।, तब तक सुदर्शन भी आ जाएगा। रघुवीर भी सकूल से लौट आएगा। तब तुम उसे ले जाना।’’

अतिथि के आने से पूर्व ही कश्मीरीलाल और सुदर्शन भी आ गए। वे नलिनी की सज-धज देखकर और उसकी कहानी सुनकर आश्चर्य करने लगे।

कुछ ही समय के बाद टैक्सी में लक्ष्मण भी आ गया।

लक्ष्मण धड़धड़ाता हुआ ड्राइंग-रूम की ओर जा रहा था कि वहाँ नलिनी को बैठे देख विस्मय से द्वार पर ही खड़ा रह गया। नलिनी ने उसे देखा तो वह भी साश्चर्य उठ खड़ी हुई। वह आँखें फाड़-फाड़कर देख रही थी कि यह क्या हो गया? क्या सेठ सिघानी ही वह अतिथि है? विद्युत की चमक की भाँति वह समझ गई कि उसका गलत स्थान पर अपने पति से सामना हो गया है। वह मन में विचार कर रही थी कि कल्याणी इत्यादि अपने अतिथि के सम्मुख उसका रहस्य भी खोल सकते हैं। सुमति पर तो उसको विश्वास था कि वह कुछ नहीं बताएगी। परन्तु कल्याणी के विषय में कुछ नहीं कहा जा सकता था। फिर भी उसने विचार किया कि तनिक-सी सावधानी बरतने से वह बच सकती है।

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