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उपन्यास >> सुमति

सुमति

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :265
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 7598

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बुद्धि ऐसा यंत्र है जो मनुष्य को उन समस्याओं को सुलझाने के लिए मिला है, जिनमें प्रमाण और अनुभव नहीं होता।


इतनी लम्बी बात सुन सुदर्शन ने कुछ डाँट के भाव में कहा, ‘‘तो तुम मुझसे रुष्ट हो गई हो, सुमति! मैं अपने विषय में कुछ नहीं विचार कर रहा। मैं तो पाप-पुण्य मानता नहीं। मेरे लिए समाज में सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करना ध्येय है और जब तक समाज यह चाहता है कि पति को पत्नी के प्रति निष्ठापूर्वक जीवन व्यतीत करना चाहिए, तुम्हें मुझसे भयभीत होने की आशंका नहीं करनी चाहिए। मेरा परमात्मा समाज है और समाज ही मेरा आत्मा है।’’

सुमति ने सन्तोष प्रकट करते हुए कह दिया, ‘‘तब तो आप आत्मा, परमात्मा के समीप पहुँच रहे हैं। आप चलते जाइए और निश्चय जानिये कि आप शीघ्र ही जीवन की इस स्थिति को भी पार कर जाएँगे।’’

‘‘इस विचार से भी हमें समाज के दुखी घटक को सान्त्वना देने के लिए चलना चाहिए। साथ ही आपको मेरे विषय में चिन्ता नहीं करनी चाहिए। उसका कारण यह है कि मेरा अवलम्बन समाज से भी बहुत बड़ा, बहुत शक्तिशाली और अधिक नेत्रों, कानों और हाथ वाला पुरुष है। समाज से विपरीत वह डराता-धमकाता नहीं, वरन् प्रेम और कल्याण की भावना से मेरा पथ-प्रदर्शन करता है।’’

‘‘मेरा विचार है कि कल किसी समय चलें। कल रविवार है। आपको अवकाश होगा। यदि नलिनी बहन को कल दिन के लिए यहाँ ले आएँ तो वह निश्चय ही सुख अनुभव करेगी।’’

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