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उपन्यास >> सुमति

सुमति

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :265
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 7598

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बुद्धि ऐसा यंत्र है जो मनुष्य को उन समस्याओं को सुलझाने के लिए मिला है, जिनमें प्रमाण और अनुभव नहीं होता।


‘‘थीं, लेकिन अब अपने कमरे में चली गई है।’’

‘‘चलो, मैं चलती हूँ। भाभी को देखकर तो मेरे तन-बदन में आग जलने लगती है।’’

दोनों बैठक में आईं तो सुदर्शन ने उठकर उसको नमस्कार किया। नलिनी ने उन दोनों को बैठाकर उनसे चाय आदि के लिए पूछा।

सुमति ने कहा, ‘‘हाँ, चाय पीएँगे तो सही, पर यहाँ नहीं। हम तुम्हें अपने साथ ‘वैंगर्स’ में ले चलेंगे। वहाँ चाय पीकर फिर तुमको अपने घर ले जाएँगे और सायंकाल तक यहाँ छोड़ जाएँगे।’’

नलिनी ने इसमें कोई आपत्ति नहीं की।

नलिनी गर्भभार से पीड़ित थी। साथ ही वह पति के व्यवहार से दुखी भी थी। वह समझ रही थी कि उसकी भाभी ने जान-बूझकर एक सुपरिचित गुंडे के साथ उसका विवाह करा दिया है। कात्यायिनी कदाचित् शीघ्र ही उसे घर से निकालने के लिए उतावली हो रही होगी। क्योंकि उस पढ़ी-लिखी की उपस्थिति में वह स्वयं को छोटी अनुभव करती थी।

सुमति द्वारा उसे अपने घर ले चलने के प्रस्ताव को सुन उसे विस्मय हुआ था। उसको विश्वास हो गया था कि डॉ० सुदर्शन ने उसका पत्र सुमति को नहीं दिखाया। डॉ० सुदर्शन और सुमति में उसको पूर्ण विश्वास और सहिष्णुता दिखाई दी। अपने स्थान पर सुमति को आसीन देखकर उसका मन कभी-कभी क्षुब्ध तो हो जाता था किन्तु सुमति का अपने साथ स्नेह एवं सुहानुभूतिपूर्ण व्यवहार देखकर उसकी समझ में यही आया कि सुमति उसे सुदर्शन की बहन के रूप में ग्रहण कर रही है।

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