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उपन्यास >> सुमति

सुमति

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :265
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 7598

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बुद्धि ऐसा यंत्र है जो मनुष्य को उन समस्याओं को सुलझाने के लिए मिला है, जिनमें प्रमाण और अनुभव नहीं होता।


‘‘उसके भैया पूछें तो क्या बताऊँ?’’

‘‘यही कि हम आए थे और नलिनी का दिल बहलाने के लिए हम उसको अपने साथ ले गए हैं। रात को भोजन वह हमारे साथ ही करेगी और फिर लौट आएगी।’’

नलिनी कपड़े बदलकर आई तो कात्यायिनी को वहीं खड़े देख त्योरी चढ़ा आरक्त मुख उसकी ओर देखने लगी। ऐसा प्रतीत होता था कि वह उसको दो-चार सुनाने ही वाली है। सुमति ने स्थिति का अनुभव कर नलिनी की बाँह-में-बाँह डाली और उसे कमरे से बाहर घसीटकर ले गई।

बाहर उनकी मोटर खड़ी थी। मोटर अभी हाल में ही आई थी। सुदर्शन कात्यायिनी को समझाने के लिए भीतर रह गया था। नलिनी ने नई मोटर देखी तो पूछा, ‘‘यह अभी ली है क्या? पुरानी मोटर कहाँ गई?’’

‘‘वह भी है। वह पिताजी की सवारी में रहती है। यह घर के प्राणियों के काम आती है। इसे मैं चलाती हूँ, उसके लिए ड्राइवर रखा हुआ है।’’

‘‘ओह, तुम मोटर चला लेती हो? मैं तो समझी थी कि तुम सर्वथा अशिक्षित हो।’’

सुमति हँस पड़ी और कहने लगी, ‘‘तुम्हारे भैया भी ऐसा ही कहते हैं कि यूनिर्वसिटी की शिक्षा के बिना तो कोई शिक्षित ही कहा नहीं जा सकता।’’

इन लोगों में ये बातें हो रही थीं कि सुदर्शन आ गया। कात्यायिनी बाहर नहीं आई। सुमति स्टेयरिंग के पीछे बैठी और वहीं अगली सीट पर उसने नलिनी को भी बैठा लिया, सुदर्शन पिछली सीट पर बैठ गया। सभी के बैठ जाने पर सुमति ने कार स्टार्ट कर दी। डॉक्टर ने आगे झुककर नलिनी को बताया, ‘‘यह कार सुमति के पिताजी ने दी है।’’

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