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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
‘‘हाँ, माँ !’’ बिहारीलाल फकीरचन्द के कहने से पहले ही बोल उठा, ‘‘भैया कहते हैं कि यदि मैं ललिता को भाभी नहीं मानूँगा, तो वह मेरे लिए कोई झगड़ालू और कुरूप बहू ढूँढ़ लायेगी।’
माँ ने हँसते हुए कहा, ‘‘हाँ देखो, तुमने उसको एक दिन काली कहा था और रात-भर रोती रही थी और न जाने मन में क्या-क्या प्रतिकार लेने के लिए विचार करती रही होगी।’’
‘‘तब तो बहुत भूल हुई माँ ! मैं उसने क्षमा माँग लूँगा और कह दूँगा कि वह पार्वती समान गोरी और सीता समान पवित्र है।’’
‘‘इस प्रकार नहीं बेटा ! जब सगाई होगी तो भाभी के चरण-स्पर्श करना। वह तुम्हारी दूसरी माँ बन जायेगी। ऐसा करोगे तो वह सदा माँ के समान तुमसे वात्सल्यता का व्यवहार रखेगी।’’
‘‘तो मेरी दो माँ होंगी?’’
‘‘और उसके मुझसे छोटा होने के कारण, मेरे पश्चात् भी, वह तुम को माँ की वात्सल्यता से वंचित नहीं होने देगी।’’
‘‘तब तो अवश्य चरण-रज माथे पर चढ़ाऊँगा।’’
‘‘और फिर उसकी हँसी उड़ाई तो कान भी खींचेगी।’’ फकीरचन्द ने कहा।
‘‘नहीं, अब नहीं उड़ाऊँगा। यह तो तब तक ही था जब तक वह भाभी नहीं बनी थी।’’
उसी रात को सेठजी ने फकीरतन्द को अपना बम्बई जाने का कार्यक्रम बता दिया। उसने कहा, ‘‘परसों सगाई की विधि होगी। मैं इसी प्रयोजन में झाँसी गया था। कुछ वस्तुएँ खरीदनी थीं।
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