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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
‘‘राम-राम, कहो, दीदी ! एक बार कहकर तो क्षमा माँग चुका हूँ। जानती हो किसके कहने से क्षमा माँगनी पड़ी थी? भैया को पता चला कि मैंने ऐसा कुछ कहा है, तो बोले कि भाभी से क्षमा माँग लो, नहीं तो वे मुझको अति कुरूप पत्नी लाकर देंगी। इसपर माँ ने कह दिया कि भाभी माँ के तुल्य होती है, इसलिए माँ मान, उनके चरणस्पर्श कर उनके आशीर्वाद माँग लेना। जब एक बार माँ मान लिया तो फिर काली-गोरी का प्रश्न ही नहीं रहता। माँ का कहना था कि माँ के विषय में तो कोई काली-गोरी सोचता ही नहीं।’’
इन्हीं दिनों बिहारीलाल की परीक्षा का फल निकल गया। उसको फकीरचन्द का तार मिला–‘उत्तीर्ण प्रथम श्रेणी में, अंक सात सौ दस।’ इस तार को पढ़कर शकुन्तला ने यह प्रस्ताव रख दिया कि उसे आगे पढ़ना चाहिए और यदि वह बम्बई में ही भर्ती हो जाये तो उसका कुछ विशेष खर्चा भी नहीं होगा। वह सेठजी के घर में ही रह सकेगा।
बिहारीलाल में भी आगे पढ़ने की लालसा जाग पड़ी। उसने अपने भाई को लिखा कि यहाँ सब लोग आगे पढ़ने के लिए कह रहे हैं। सबका विचार है कि पढ़ाई से मन का विकास होता है।’
इसपर फकीरचन्द का पत्र आया, ‘‘मैं तुम्हारे और अधिक पढ़ने में आपत्ति नहीं करता; परन्तु पढ़ाई, पढ़ाई के लिए तो समाप्त हो गई। आगे पढ़ाई किसी अन्य उद्देश्य के लिए होनी चाहिए। तुम्हारा और अधिक पढ़ाई में क्या उद्देश्य है, यह जानना चाहता हूँ। साथ ही यह लिखो कि यूनीवर्सिटी की पढ़ाई किस प्रकार उस उद्देश्य की पूर्ति कर सकेगी।’
बिहारीलाल ने इसके उत्तर में केवल यह लिखा, ‘‘मानसिक विकास ही मेरा उद्देश्य है। तदनन्तर मैं आपको साथ खेतों में काम करना चाहूँगा।’’
फकीरचन्द ने उत्तर दिया, ‘‘बम्बई में प्रवेश प्राप्त करने का यत्न करो, परन्तु तुमको छात्रावास में रहना होगा, सेठजी के घर पर नहीं।’’
बिहारीलाल को जग्गूमल गूजरमल कॉलेज में प्रवेश मिल गया। साथ ही उसने उस कॉलेज के होस्टल में रहने के लिए स्थान ले लिया।
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