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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


‘‘अच्छा, एक बात समझ लो कि यह व्रत विवाह के विरोध में होगा, मरने के लिए नहीं। इस कारण मरने में जितनी देर लगे, उतना ही ठीक होगा। इसके लिए तुम समय-समय पर नमक और पानी लेती रहोगी तो पिताजी को विचार करने और तुम्हारा दृष्टिकोण समझने के लिए समय मिल जायेगा।’’

यह बात ललिता मान गई ! इसपर भी शकुन्तला ने अपने माता-पिता को ललिता के निर्णय के विषय में नहीं बताया। वह समझती थी कि ललिता एक बहुत बड़ा परीक्षण करने जा रही है। इस कारण वह इसमें न तो सहायक होगी और न ही उसको मना करेगी।

शकुन्तला जब अपने सोने के कमरे में गई, तो उसकी माता वहाँ आकर पूछने लगी, ‘‘ललिता विवाह कैसे रोक सकेगी? सेठजी ने तो जब्बलपुर लिख भेजा है कि विवाह इसी मास में हो जाना चाहिए।’

‘‘ललिता कुछ बताती नहीं। उसने केवल यह कहा है कि यह विवाह नहीं हो सकता।’’

‘‘तो क्या विष खा लेगी?’’

‘‘यह मैं कैसे बता सकती हूँ !’’

‘‘तो मैं उसके कमरे में से सब खाने-पीने वस्तुएँ उठा देती हूँ और अभी नौकरानी को कहकर वहाँ की तलाशी ले लेना चाहती हूँ, जिससे कोई ऐसी-वैसी वस्तु वह अपने पास न रख सके।’’

‘‘माँ ! तुम क्या समझती हो कि विष खाकर ही मरा जा सकता है?’’

‘‘फाँसी लटक सकती है। इससे उसको मैं तुम्हारे कमरे में सोने के लिए कह दूँगी।’’

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