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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
‘‘क्यों, क्या हानि हुई है उससे?’’
‘‘मैंने चैम्बर वालों को ऐसा करने से रोक दिया है।’’
‘‘क्यो?’’
‘‘इस कारण कि मेरे पास तो केवल वह बीस हजार ही है और आपकी तो करोड़ रुपये से भी अधिक की सम्पत्ति है। उस सबको रखते हुए, आपने मेरे बीस हजार पर नजर डाली, तो उससे आपकी बदनामी हो गई है। चैम्बर वाले यह समझने लगे हैं कि कदाचित् आपका दिवाला निकलने लगा है।’’
‘‘तुमने चैम्बर वालों को मना कर अच्छा नहीं किया।’’
‘‘आपसे मुझसे पहले पूछा क्यों नहीं? मैंने उस रुपये की जमानत पर स्वयं सौदा करने का विचार किया हुआ था। यदि वह रकम आपके नाम पर बदल दी जाती, तो मैं क्या करता?’’
‘‘पर यह रुपया तो मेरा ही था।’’
‘‘आपसे पहले मेरे बाबा का था। भला यह भी कोई युक्ति है? देखिये पिताजी ! घर जाते ही तुरन्त बीस हजार की जमानत चैम्बर में भेज दीजियेगा, अन्यथा कल तक नालिशें हो जायेंगी। यह ठीक नहीं होगा।’’
सेठ कुन्दनलाल ने घड़ी में समय देखकर कहा, ‘‘बहुत देर हो गई है। मुझको जल्दी घर जाना है। अच्छा, अब मैं चलता हूँ। होटल का बिल तुम दे देना और बिल मेरे पास भेज देना। मैं अदा कर दूँगा।’’
इतना कह सुन्दरलाल का पिता अपनी पत्नी सहित वहाँ से उठ बाहर निकल गया। उसके चले जाने के पश्चात् सूसन ने कहा, ‘‘मैं कई दिनों से एक समस्या पर विचार कर रही हूँ। वह है आप धनी आदमियों में युक्ति-हीनता।’’
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