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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


गिरधारी इतना लम्बा-चौड़ा हिसाब नहीं जानता था। उसने कहा, ‘‘सूरज भैया ! मुझको तो यह पता है कि जब मैं बम्बई में काम करता था, तो मुश्किल से रोटी ही खा पाता था और यहाँ आने पर तो मैं खा-पीकर कुछ बचा भी सका हूँ। पिछले महीने वह बबूल के पेड़ के पास वाली भूमि खाली हुई थी, तो मैंने राजा साहब से ले ली। वह भूमि मैंने अधिया पर दे दी है और उसमें से मुझको इस वर्ष खाने-पीने के लिए अन्न मिल जाएगा। परिणाम यह होगा कि मेरे पास एक सौ रुपया और अधिक बच जाएगा।’’

‘‘तुम मूर्ख हो गिरधारी ! यह तो ठीक है कि तुम्हारी हालत पहले से अच्छी है, परन्तु इससे भी अच्छी होनी चाहिए। तुम्हारी मेहनत में से यह बाबू चोरी कर रहा है।’’

गिरधारी को कुछ-कुछ समझ आने लग गया था। यद्यपि वह यह नहीं समझ सका था कि फकीरचन्द न होता, तो उसका और उसके परिवार का क्या होता, तो भी उसकी यह बात समझ में आई थी कि फकीरचन्द कुछ काम-धन्धा तो करता नहीं, फिर उसको इतनी आय क्यों मिलती है?

गिरधारी के मन में असन्तोष जड़ पकड़ गया। इस प्रकार एक-एक कर फकीरचन्द के कर्मचारियों में असन्तोष भरा जाने लगा। इस असन्तोष का प्रत्यक्ष रूप बनने लगा। मोतीराम और सूर्यकान्त मजदूरों की सभाएँ बुलाने लगे।

दोनों ने बाजार में एक मकान लिया हुआ था। रात के समय वे दोनों मजदूरों को वहाँ बुला लेते थे और उनसे बातें करते थे। गिरधारी तो वहाँ नित्य जाने लगा था। एक दिन सूर्यकान्त ने कहा, ‘‘मैं समझता हूँ कि हमें कुछ यत्न करना चाहिए। केवल बातों से काम नहीं चलेगा।’’

गिरधारी, जो अपनी दुर्दशा को सबसे अधिक अनुभव करता था, पूछने लगा, ‘‘सूरज भैया ! क्या करना चाहिए?’’

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