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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


इसका उत्तर गिरधारी के पास नहीं था। इसपर शेषराम ने कह दिया, ‘‘इसको भैया सूर्यकान्त ने बताया है कि इसकी योग्यता सौ रुपये मासिक की है। मुझको भी उसने बताया था कि सौ रुपया महीना मिलना चाहिए।’’

‘‘तो भैया गिरधारी ! तुम सूर्यकान्त को कहो कि वह तुझको सौ रुपये महीने पर नौकर रख ले।’’

गिरधारी ने कह दिया, ‘‘जो हमको अक्ल की बात कहे, उसको ही हम डाँटने लगें, तो फिर कौन यहाँ आकर, हमको नई-नई बातें बताएगा?’’

‘‘तो फिर कैसे पता चले कि गिरधारी भैया सौ रुपये महीना पाने की योग्यता रखते हैं?’’

एक बीच में से ही बोल उठा, ‘‘गिरधारी भैया ! मैं कितने के योग्य हूँ?’’

‘‘तुमको पचास रुपये मासिक मिलने चाहिएँ।’’

‘‘जानते हो, बाबू फकीरचन्द के आने से पहले मुझको क्या मिलता था?–दस रुपये महीना। अब मुझको पच्चीस मिलते हैं। आज बाबू मुझको निकाल दे, तो अब दस रुपये भी नहीं मिल सकेंगे।’’

‘‘पर, बाबू हमसे काम भी तो खूब लेता है।’’

‘‘तो तुम्हारा मतलब है कि बिना काम के वेतन दे दिया करें?’’

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