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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।

3

सूसन को बिहारीलाल की व्यापार की विवेचना सुन बहुत ही चिन्ता लग गई थी। वह समझ गई थी कि कोई भी काम, जिससे समाज को व्यक्तिगत रूप में अथवा सामूहिक रूप में लाभ न हो, करना हेरी-फेरी करना है। समाज के घटकों के लिए कुछ निर्माण करना ही वास्तविक काम है। शेष तो काम कहा ही नहीं जा सकता और उससे लाभ उठाना चोरी करना है।

वह इन विचारों पर कई दिन तक मनन करती रही। कभी-कभी सुन्दरलाल उसको बता देता था कि उसको महीने में इतने हजार का लाभ हुआ है। यह सुन वह गम्भीर हो जाती थी। वह अपने मन में पूछती थी कि समाज को क्या लाभ हुआ है इस काम से, जिससे उसके पति को इतने हजार का लाभ हुआ है? एक दिन उससे रहा नहीं गया। उसने पूछ ही लिया, ‘‘आपको इन दिनों दस हजार का लाभ हुआ है? यह रुपया कहाँ से आया?’’

सुन्दरलाल इस प्रश्न का अभिप्राय नहीं समझा। उसने पूछा, ‘‘आता कहाँ से? मैंने पिछले सप्ताह चैम्बर में दस हजार रुपया जमा करा दिया था और दस हजार तोला सोना खरीदा था। मेरा मतलब है कि चैम्बर में कई लोग उस दिन सोना बेच रहे थे। मैंने खरीद लिया। कुछ ही दिन में सोने का भाव चार आने तोला बढ़ गया। मैंने अपना सोना बेच दिया। इस प्रकार मुझको इस एक ही सौदे में ढाई हजार रुपये का लाभ हो गया।’’

‘‘तो यह लाभ उन बेचने वालों ने दिया है? पर मैं पूछती हूँ कि इन ढाई हजार के बदले में आपने समाज का अथवा उन आदमियों का ही, जिन्होंने वह ढाई हजार आपको दिया है, क्या किया है?’’

‘‘करता क्या? भाव बढ़ गया, इस कारण उनको मुझे चार आने प्रति तोला देना पड़ा।’’

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