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नाटक-एकाँकी >> चन्द्रहार (नाटक)

चन्द्रहार (नाटक)

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :222
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8394

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‘चन्द्रहार’ हिन्दी के अमर कथाकार प्रेमचन्द के सुप्रसिद्ध उपन्यास ‘ग़बन’ का ‘नाट्य–रूपांतर’ है

सातवाँ दृश्य

(संध्या आने वाली है। वही रमानाथ का कमरा। जालपा बैठी हैं। उसका मुँह पीला पड़ रहा है। वह काँप रही है जैसे उसने कोई पाप किया हो। उससे कुछ दूर देवीदीन बैठा है, मुँह लटकाये, सुस्त। सहसा मुँह उठाकर कहता है– )

देवीदीन– पुलिस ने जिसे एक बार बूटी सुँघा दी। उस पर किसी दूसरी चीज का असर नहीं हो सकता।

जालपा– (घृणा से) यह सब कायरों के लिए है। वे मुझसे वादा करके गये थे पर अदालत में उन्होंने मुझसे नजर तक नहीं मिलायी। वही कहा जो पुलिस ने लिखाया था।

(देवीदीन मौन रहता है। कई क्षण फिर सन्नाटा रहता है। फिर सहसा जालपा पूछती है– )

जालपा– क्यों, दादा, अब और कहीं तो अपील न होगी? कैदियों का यहीं फैसला हो जायगा?

देवीदीन– नहीं, हाईकोर्ट में अपील हो सकती है।

(फिर क्षणिक सन्नाटा)

जालपा– दादा! उन्होंने जो किया है वह तो देख लिया। मेरा जी चाहता है कि आज जज साहब से मिल कर सारा हाल कह हूँ।

देवीदीन– (आँखें फाड़ कर) जज साहब से!

जालपा– हाँ।

देवीदीन– हाकिम का वास्ता है बहू जी! न जाने चित्त पड़े या पट।

जालपा– क्या वह पुलिस वालों से यह नहीं कह सकता कि तुम्हारा गवाह बनाया हुआ है, झूठा है।

देवीदीन– कह तो सकता है।

जालपा– तो आज मैं उससे मिलूँ? मिल तो लेता है?

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