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ग्राम्य जीवन की कहानियाँ (कहानी-संग्रह)

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :268
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8459

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उपन्यासों की भाँति कहानियाँ भी कुछ घटना-प्रधान होती हैं, मगर…


मैं विस्म य से गोपा का मुँह देखने लगा। तो इसे यह शोक-समाचार मिल चुका है। फिर भी वह शान्ति! और यह अविचल धैर्य! बोला–अच्छाि किया न गयीं, रोना ही तो था।

‘हाँ और क्या ? रोयी यहाँ भी, लेकिन तुमसे सच कहती हूँ, दिल से नहीं रोयी। न जाने कैसे आँसू निकल आये। मुझे तो सुन्नीय की मौत से प्रसन्ननता हुई। अपनी ‘मान-मर्यादा’ लिए संसार से विदा हो गयी, नहीं तो न जाने क्याो-क्यास देखना पड़ता। इसलिए और भी प्रसन्नन हूँ कि उसने अपनी आन निभा दी। स्त्रीख के जीवन में प्याार न मिले; तो उसका अन्त हो जाना ही अच्छाप। तुमने सुन्नी‍ की मुद्रा देखी थी? लोग कहते हैं, ऐसा जान पड़ता था–मुस्कहरा रही है। मेरी सुन्नीन सचमुच देवी थी। भैया, आदमी इसलिए थोड़े ही जीना चाहता है कि रोता रहे। जब मालूम हो गया कि जीवन में दुःख के सिवा कुछ नहीं है, तो आदमी जीकर क्याा करे। किस लिए जिये? खाने और सोने और मर जाने के लिए? यह मैं नहीं कहती कि मुझे सुन्नीह की याद न आयेगी और मैं उसे याद करके रोऊँगी नहीं। लेकिन वह शोक के आँसू न होंगे। हर्ष के आँसू होंगे। बहादुर बेटे की माँ उसकी वीरगति पर प्रसन्नक होती है! सुन्नी् की मौत में क्याक कुछ कम गौरव है? मैं आँसू बहाकर उस गौरव का अनादर कैसे करूँ? वह जानती  है, और चाहे सारा संसार उसकी निंदा करे, उसकी माता सराहना ही करेगी। उसकी आत्माै से यह आनन्द भी छीन लूँ? लेकिन अब रात ज्यामदा हो गयी है। ऊपर जा कर सो रहो। मैंने तुम्हांरी चारपाई बिछा दी है; मगर देखो, अकेले पड़े-पड़े रोना नहीं। सुन्नी  ने वही किया, जो उसे करना चाहिए था। उसके पिता होते, तो आज सुन्नीो की प्रतिमा बनाकर पूजते।’

मैं ऊपर जा कर लेटा, तो मेरे दिल का बोझ बहुत हल्काा हो गया था, किन्तु  रह-रहकर यह संदेह हो जाता था कि गोपा की यह शक्ति उसकी अपार व्य‍था का ही रूप तो नहीं है।

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