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प्रेमाश्रम (उपन्यास)

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :896
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8589

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‘प्रेमाश्रम’ भारत के तेज और गहरे होते हुए राष्ट्रीय संघर्षों की पृष्ठभूमि में लिखा गया उपन्यास है


ज्ञान– आज यहाँ थियेट्रिकल कम्पनी का तमाशा होने वाला है। आपसे पूछने आया हूँ कि आपके लिए भी जगह रिजर्व कराता आऊँ? आज बड़ी भीड़ होगी।

गायत्री– विद्या से पूछा, वह जायेगी?

ज्ञान– वह तो कहती है कि माया को साथ लेकर जाने में तकलीफ होगी। मैंने भी आग्रह नहीं किया।

गायत्री– तो अकेले जाने पर मुझे भी कुछ आनन्द न आयेगा।

ज्ञान– आप न जाएँगी तो मैं भी न जाऊँगा।

गायत्री– तब तो मैं कदापि न जाऊँगी। आपकी बातों में मुझे थिएटर से अधिक आनन्द मिलता है। आइए, बैठिए। कल की बात अधूरी रह गयी थी। आप कहते थे, स्त्रियों में आकर्षण-शक्ति पुरुषों से अधिक होती है पर आपने इसका कोई कारण नहीं बताया था।

ज्ञान– इसका कारण तो स्पष्ट ही है। स्त्रियों का जीवन-क्षेत्र परिमित होता है और पुरुषों का विस्तृत। इसीलिए स्त्रियों की सारी शक्तियाँ केन्द्रस्थ हो जाती हैं और पुरुषों की विच्छिन्न।

गायत्री– लेकिन ऐसा होता तो पुरुषों को स्त्रियों के अधीन रहना चाहिए था। वह उन पर शासन क्योंकर करते?

ज्ञान– तो क्या आप समझती हैं कि मर्द स्त्रियों पर शासन करते हैं? ऐसी बात तो नहीं है। वास्तव में मर्द ही स्त्रियों के अधीन होते हैं। स्त्रियाँ उनके जीवन की विधाता होती हैं। देह पर उनका शासन चाहे न हो, हृदय पर उन्हीं का साम्राज्य होता है।

गायत्री– तो फिर मर्द इतने निष्ठुर क्यों हो जाते हैं?

ज्ञान– मर्दों पर निष्ठुरता का दोष लगाना न्याय-विरुद्ध है। वह उस समय तक सिर नहीं उठा सकते, जब तक या तो स्त्री स्वयं उन्हें मुक्त न कर दे, अथवा किसी दूसरी स्त्री की प्रबल विद्युत शक्ति उन पर प्रभाव न डाले।

गायत्री– (हँसकर) अपने तो सारा दोष स्त्रियों के सिर रख दिया।

ज्ञानशंकर ने भावुकता से उत्तर दिया– अन्याय तो वह करती हैं, फरियाद कौन सुनेगा? इतने में विद्यावती मायाशंकर को गोद में लिये आकर खड़ी हो गयी। माया चार वर्ष का हो चुका था, पर अभी तक कोई बच्चा न होने के कारण वह शैशवावस्था के आनन्द को भोगता था।

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