वरदान (उपन्यास) - प्रेमचन्द Vardan (novel) - Hindi book by - Premchand
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वरदान (उपन्यास)

प्रेमचन्द


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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :259
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8670

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‘वरदान’ दो प्रेमियों की कथा है। ऐसे दो प्रेमी जो बचपन में साथ-साथ खेले...

(२) वैराग्य

मुंशी शालिग्राम बनारस के पुराने रईस थे। जीवन-वृत्ति वकालत थी और पैतृक सम्पत्ति भी अधिक थी। दशाश्वमेध घाट पर उनका वैभवान्वित गृह आकाश को स्पर्श करता था। उदार ऐसे कि पचीस-तीस हजार की वार्षिक आय भी व्यय को पूरी न होती थी। साधु-ब्राह्मणों के बड़े श्रद्धावान थे। वे जो कुछ कमाते, वह स्वयं ब्रह्मभोज और साधुओं के भण्डारे एवं सत्कार्य में व्यय हो जाता। नगर में कोई साधु-महात्मा आ जाय, वह मुंशी जी का अतिथि। संस्कृत के ऐसे विद्वान की बड़े-बड़े पंडित उनका लोहा मानते थे। वेदान्तीय सिद्धान्तों के वे अनुयायी थे। उनके चित्त की प्रवृत्ति वैराग्य की ओर थी।

मुंशीजी को स्वभावतः बच्चों से बहुत प्रेम था। मुहल्ले-भर के बच्चे उनके प्रेम-वारि से अभिसिंचित होते रहते थे। जब वे घर से निकलते थे तब बालकों का एक दल उनके साथ होता था। एक दिन कोई पाषाण-हृदया माता अपने बच्चे को मार रही थी। लड़का बिलख-बिलखकर रो रहा था। मुंशीजी से न रहा गया। दौड़े, बच्चे को गोद में उठा लिया और स्त्री के सम्मुख अपना सिर झुका दिया। स्त्री ने उस दिन से अपने लड़के को न मारने की शपथ खा ली। जो मनुष्य दूसरे के बालकों का ऐसा स्नेही हो, वह अपने बालक को कितना प्यार करेगा, सो अनुमान से बाहर है। जब से पुत्र पैदा हुआ, मुंशीजी संसार के सब कार्यों से अलग हो गए। कहीं वे लड़के को हिंडोले में झुला रहे हैं और प्रसन्न हो रहे हैं, कहीं वे उसे एक सुन्दर सैरगाड़ी में बैठाकर स्वयं खींच रहे हैं। एक क्षण के लिए भी उसे अपने पास से दूर नहीं करते थे। वे बच्चे के स्नेह में अपने को भूल गए थे।

सुवामा ने लड़के का नाम प्रतापचन्द्र रखा था। जैसा नाम था वैसे ही उसमें गुण भी थे। वह अत्यन्त प्रतिभाशाली और रूपवान था। जब वह बातें करता, सुनने वाले मुग्ध हो जाते। भव्य ललाट दम-दम करता था। अंग ऐसे पुष्ट कि द्विगुण डील वाले लड़कों को भी वह कुछ न समझता था। इस अल्प आयु ही में उसका मुखमण्डल ऐसा दिव्य और ज्ञानमय था कि यदि वह अचानक किसी अपरिचित मनुष्य के सामने आकर खड़ा हो जाता तो वह विस्मय से ताकने लगता था।

इस प्रकार हंसते-खेलते छः वर्ष व्यतीत हो गए। आनन्द के दिन पवन की भांति सन्न से निकल जाते हैं और पता भी नहीं चलता। वे दुर्भाग्य के दिन और विपत्ति की रातें हैं, जो काटे नहीं कटतीं। प्रताप को पैदा हुए अभी कितने दिन हुए! बधाई की मनोहारिणी ध्वनि कानों में गूंज रही थीं कि छठी वर्षगांठ आ पहुंची। छठे वर्ष का अन्त दुर्दिनों का श्री गणेश था। मुंशी शालिग्राम का सांसारिक सम्बन्ध केवल दिखावटी था। वह निष्काम और निस्सम्बन्ध जीवन व्यतीत करते थे। यद्यपि प्रकट वह सामान्य संसारी मनुष्यों की भांति संसार के क्लेशों से क्लेशित और सुखों से हर्षित दृष्टिगोचर होते थे, तथापि उनका मन सर्वथा उस महान और आनन्दपूर्ण शांति का सुख भोग करता था, जिस पर दुःख के झोंकों और सुख की थपकियों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

माघ का महीना था। प्रयाग में कुम्भ का मेला लगा

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