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गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :590
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 9552

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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।


‘‘तो तुम ही चले जाओ।’’

‘‘मैं तो सेवा-कार्य से निकाल दिया गया हूँ, महाराज!’’

‘‘कौन कहता है?’’

‘‘मेरे गृह पर राज्य का ताला लगा दिया गया है। मेरा वेतन न देना और मेरी पत्नी का अपमान करना, ये सब बातें इस बात की तो सूचक है कि मैं यहाँ पर सम्मानित व्यक्ति नहीं रहा।’’

‘‘यह बात नहीं है संजय! अच्छा आप बिश्राम कीजिये। हमारा विचार है कि लम्बी यात्रा से आप थक गये होंगे। आपका गृह खोल दिया गया है।’’

यह ठीक था कि वापस पहुँचने से पूर्व ही ताला खुल चुका था और मेरी पत्नी सामान इत्यादि भीतर सुव्यवस्थित कर भोजनादि के प्रबन्ध में लग चुकी थी। इस बार तीनों बच्चे हम पिताजी के पास छोड़ आये थे।

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