लोगों की राय

उपन्यास >> अवतरण

अवतरण

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :590
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 9552

Like this Hindi book 4 पाठकों को प्रिय

137 पाठक हैं

हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।


‘‘आपको उनके पास रहकर राज्य-कार्य में सहायता करनी चाहिए।’’

‘‘उनको मेरी सहायता की कुछ भी आवश्यकता नहीं, और फिर मैं सबसे बड़ी सहायता तो यह कर रहा हूँ कि मैं अपना व्यय उनसे नहीं ले रहा। मैं वर्ष में नौ मास यहाँ रहता हूँ।’’

‘‘इस पर भी आपका यहाँ रहना भारी निन्दा का कारण बन रहा है।’’

‘‘कौन निन्दा करता है मेरी?’’

‘‘कोई अन्य क्या करेगा? आपकी बहन ही इसको उचित नहीं समझती। फिर यहाँ राज-परिवार वालों के मन में आपकी प्रतिष्ठा कम हो रही है।’’

‘‘यह बात असत्य है। बहन मुझसे बहुत प्रसन्न है। भीष्मजी ने मेरे लिए एक प्रासाद और कई दास-दासियाँ नियुक्त कर रखी है। दुर्योधन भीष्मजी से कहकर मेरे निर्वाह के लिए धन दिलवा रहा है। ये सब मेरी सेवाओं के उपलक्ष में है। मैं ऐसा प्रबन्ध कर रहा हूँ कि दुर्योधन शीघ्रातिशीघ्र राजकार्य के योग्य हो जाय। मैं दुर्योधन के प्रति वही कार्य कर रहा हूँ जो आप महाराज के लिए कर रहे है।’’

इस पर मेरे कहने के लिए कुछ नहीं रहा। मैं द्रोणाचार्य के धनुर्विद्या सिखाने के ढंग से बहुत प्रभावित हुआ और मैं यह देख रहा था कि राजकुमार और उनके साथ वह सुन्दर युवक, जो पीछे इनमें आकर सम्मिलित हुआ था, धनुर्विद्या में निपुण हो रहे है। उसको अति कठिन लक्ष्य बींधते देख मैंने शकुनि से पूछ लिया, ‘‘वह युवक कौन है? यह राजकुमार नहीं है।’’

‘‘यह तो सूत-अधिरथ पुत्र कर्ण है।’’

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book