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उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
‘‘परन्तु नारदजी! क्या आप यहाँ विनाश की इच्छा से घूम रहे हैं?’’
‘‘मैं देवेन्द्र की आज्ञा से घूम रहा हूँ। देवेन्द्र ने कंस का कारावास भगवान् को विशेष शक्ति के अवतरण के लिए उपयुक्त समझा है। उस अंश के यहाँ आने से पूर्व मुझको यहाँ भेजा गया था। मैंने ही कंस को देवकी की सब सन्तानों को मार डालने की सम्मति दी थी। मैंने ही कंस के मन में यह भय बैठा दिया था कि देवकी की वसुदेव से सन्तान ही उसको मारा डालेगी। इसी कारण उसने यह घोर पाप किया है।’’
‘‘परन्तु मुनिवर! मुझको आप देवताओ की नीति समझ में नहीं आ रही। आप स्वयं ही इनसे पाप-कर्म कराते हैं और फिर स्वयं ही उस पाप के दण्ड की व्यवस्था करते हैं।’’
नारद ने गम्भीर होकर कहा, ‘‘वास्तव में पाप हम नहीं कराते। यह पाप तो दुष्ट लोगों की प्रवृत्ति कराती है। हम तो उस पाप की दिशा को ऐसा मोड़ देते है, जिसमें वे शीघ्रातिशीघ्र फलदायक हों और पापी का नाश कर सकें। यदि हम ऐसा न करें तो पाप इतना फलने लगे कि जन-साधारण अत्यन्त दुःखी हो जायें।
‘‘अब यही कंस का उदाहरण लो। वह प्रकृति से दुष्ट है। इसकी दुष्टता का कारण इस परिवार के लोगों का परमात्मा और कर्मफल पर अविश्वास है। ये समझते हैं कि इनके किसी भी कर्म का फल देने वाला संसार में नहीं है। वे स्वयं सर्वशक्तिमान शासक है। अतः यहाँ पर न तो किसी धनीमानी का धन सुरक्षित है और न ही किसी सतीसाध्वी का मान। कंस अपने सैनिकों के साथ मथुरा के राज्य पर असीम उच्छृंलता कर रहा है। इससे यहाँ घोर अन्यायाचरण प्रचलित हो रहा है। अतः हमने कंस के इस पाप की प्रवृत्ति की दिशा मोड़ उसका मुख साधारण प्रजा की ओर से घुमाकर उसके अपने ही परिवार की ओर कर दिया है, जिससे भगवान् की शक्ति के अवतरण के लिए उचित स्थान बन जाय।
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