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गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :590
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 9552

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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।


कंस का चरित्र-चित्रण सुनकर मैं समझ गया कि मेरे करने से कुछ नहीं होगा। मैं चाहता तो यही था कि कंस को समझा-बुझाकर उचित मार्ग पर ले आया जाय, परन्तु मुझे सन्देश था ऐसा होगा नहीं।

एक नास्तिक जब राज-पदवी पा जाता है और देखता है कि संसार में उसको दण्ड देने की क्षमता किसी में नहीं है और संसार के ऊपर किसी अन्य शक्ति का उसे विश्वास नहीं होता, तब वह घोर अन्यायाचरण करने में भी संकोच नहीं करता। ऐसे प्राणी के नाश का प्रबन्ध परमात्मा, प्रकृति अथवा पापी की अपनी प्रवृत्ति करना ही आरम्भ कर देती है।

मुझको चुप देख नारद ने पुनः कहा, ‘‘यह कंस, शिशुपाल इत्यादि तो बहुत ही साधारण व्यक्ति है। इनका विनाश हो होना ही है। साथ ही एक इससे भी बड़ी पापमय शक्ति के विनाश का आयोजन हो रहा है। कुरुवंशीय भी व्यापक धर्म को भूल, अपने अधीन पूर्ण प्रजा को पाप के मार्ग पर लिये जा रहे है। उनको भी तो आप समझाते ही हैं। क्या वे समझ रहे हैं? अब सुनिये।

‘‘पांडु, जो धृतराष्ट का कनिष्ठ भ्राता है और जो वास्तव में भारत का सम्राट् होने की योग्यता रखता है, जिसने पूर्ण भारत में कुरुवंश का डंका बजा दिया है, आजकल श्रापित अवस्था में शतश्रृंग पर्वत पर घोर तपस्या कर रहा है। उसने किंदम नाम के एक ऋषि की हत्या की थी, जिससे इसके स्नायु-मण्डल पर ऐसा प्रभाव पड़ा है कि वह स्त्री संभोग के सर्वथा अयोग्य हो गया है। उसने अपनी पत्नियों–कुन्ती और माद्री को नियोग से सन्तान उत्पन्न करने को कहा तो उन्होंने देवताओं से समागम कर पाँच पुत्र प्राप्त किये हैं। ये देवताओं के वीर्य से उत्पन्न और शतश्रृंग पर्वत पर रहने वाले ऋषियों और मुनियों की शिक्षा के प्रभाव से ऐसे बलशाली, धनुर्धारी औ धर्म-कर्म के मर्म को समझने वाले होंगे कि वे भारत देश में पुनः धर्म की स्थापना में समर्थ होंगे।’’

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