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उपन्यास >> गंगा और देव

गंगा और देव

आशीष कुमार

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :407
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 9563

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आज…. प्रेम किया है हमने….


‘कसम से भाई! कभी किसी से प्यार न हो, तो ही अच्छा है!’ देव की हालत देख मैंने सोचा....

देव की आँखें गीली हो ही गईं। प्यार के गम की हवा ने भाप का रूप लिया। फिर भाप ने बादलों का रूप। फिर इन बादलों ने बरसात शुरू कर दी झमाझम और मूसलसदार बरसात। मैंने देखा....

पर गायत्री ने देव के आँसू पकड़ लिये। कमरे में बड़ी खामोशी छा गयी। गायत्री ने देव का नासूर जैसा, कभी न खत्म होने वाला अन्तहीन दुख पहचाना।

तभी अचानक ......

गायत्री उठी बड़ी तेजी से और उसने देव को पीछे से जकड़ लिया बड़ी शक्ति, बड़े वेग, बड़ी सामर्थ्य से ....टाइटेनिक फिल्म के पोस्टर की तरह ...बड़ी तेजी से अपनी पतली-पतली मेहँदी की टहनियों जैसी पतली और नाजुक बाहों से।

देव ने कोई विरोध ना किया।

गायत्री ने सफेद रंग का गाउन पहना था जिसमें सफेद रंग के गुलाब के फूल प्रिन्टिड थे। साथ ही गायत्री ने कोई बहुत अच्छा पर्फ्यूम भी लगाया था ...जिससे देव का तन मन भीग गया। रोआँसे दुखी और मन से टूटे देव को जैसे राहत मिली।

आज! ...गायत्री के पार्श्व में आकर, आज! ...गायत्री की शरण में आकर, आज!.... गायत्री के स्पर्श से जैसे देव को एक वरदान सा मिला! एक अभयदान सा मिला! देव को आज.... जैसे एक नया जीवनदान सा मिला। मैनें महसूस किया...

प्यार के हारे देव को शायद इस समय मुन्नाभाई की जादू वाली झप्पी की जैसे बहुत जरूरत सी थी जो उसे गायत्री ने दी सही समय पर।

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