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उपन्यास >> गंगा और देव

गंगा और देव

आशीष कुमार

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :407
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 9563

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आज…. प्रेम किया है हमने….


कसम से भाई! प्यार-व्यार बकवास चीज ही होती है। अब तो यही जान पड़ रहा है ये कहानी सुनकर। तब ही टीवी, फिल्म के हर किरदार, लगभग हर हीरो-हीरोइन हमेशा रोते रहते हैं। अब मुझे पूरा चक्कर समझ में आ रहा है। मैंने पाया....

‘‘गंगा! गायत्री ने हमें बहुत समझाया था कि ‘देव! ये लोग हलवाई हैं! ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं होते! बुद्विजीवी नहीं होते! ये लोग भावनाओं को नहीं समझते!... प्यार-व्यार, जज्बात, दिल की बात, हदय के उद्गार नहीं समझते ये लोग!... हलवाई ज्यादा सेन्टी टाइप के नहीं होते!... ये लोग मशीनों की तरह व्यवहार करते हैं!... हलवाइयों से प्यार करने की गल्ती न करो देव! इन्हें प्रेम का पाठ मत सिखाओ!... पर हमने किसी की बात नहीं सुनी, कितने मूर्ख हैं?..कितने गधे हैं हम?’ आज हमें पता चलता है! तुमसे ही प्यार कर बैठे!... तुम्हें ही अपना सबकुछ!.. अपना भगवान मान लिया!‘‘

देव ने ये पंक्तियाँ लिखी थीं... बड़े गुस्से में आकर अपने आप को कोसते हुए।

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‘‘गंगा! अब हम कहीं पर जाते है तो संभल कर! फूंक- फूंक कर जमीन पर कदम रखते हैं! डरतें है कही ऐसा न हो कि हमारे पैरो तले कोई जीव दबकर मर जाए, हमें पाप लग जाए और तुम हमारे प्रेम को न पहचानो!‘‘ देव ने रोते-रोते गंगा को बताया था।

भाई साहब! प्यार-व्यार न हो गया कैंसर, टीवी जैसी असाध्य और लाइलाज बीमारी हो गई, मैंने सोचा। इसीलिए पुराने जमाने के लोग इसे ‘प्रेमरोग‘ के नाम से बुलाते हैं... जो आसानी से लगता नहीं और अगर लग जाये तो आसानी से छूटता नहीं। देव के दुख देखकर मैंने जाँच-पड़ताल की....

चुनरी लहराई ... ... ...
चूड़ी खनकाई ... .......
पायल छनकाई ... ......
लिया! बेचैनी का जो ........ग!
लगा लगा लगा रे!.... लगा लगा लगा रे!
लगा लगा लगा रे!.....लगा प्रेमरोग!
लगा लगा लगा रे!.....लगा प्रेमरोग!    

मैनें ये गीत गाया देव की इस कश्मकश वाली स्थिति को देखकर ।

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