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उपन्यास >> गंगा और देव

गंगा और देव

आशीष कुमार

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :407
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 9563

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आज…. प्रेम किया है हमने….


गायत्री ने एक जग में खूब सारा बर्फ वाला ठंडा पानी भर के रख लिया था कि अगर गंगा सोये तो ठंडे पानी के छींटे मारकर उसे जगाया जा सके।

वहीं देव की अमीर माँ सावित्री ने सोने के कई जेवर अपनी मुट्ठी में ले लिये थे कि अगर मंत्रो के दौरान गंगा को कुंभकर्ण वाली नींद आये तो सोने के जेवरों का लालच देकर नींद को भगा दें।

वहीं गंगासागर हलवाई ने ढेर सारे पानी के बतासे एक थाली में रख लिये थे कि जब ठंडे पानी और सोने के जेवर फेल हो जायेगे तो पानी के बतासे गंगा को दिखा देंगे। चूँकि गंगा को पानी के बतासे बहुत पसन्द हैं... इसलिए तुरन्त ही गंगा की वो कुंभकर्ण वाली नींद भाग जायेगी।

वहीं गंगा की माँ ने लोहे के चिमटे को खूब गर्म करके अपने पास रख लिया था कि जब पानी के चटपटे बतासे भी फेल हो जायेंगे तो रुकमणि अन्त में गंगा को गरम-गरम चिमटा छुआ देगी।

‘हाय! हाय! देव... अरे ये कैसी लड़की से प्यार करता है तू!’ गीता मामी ने ताना मारा। उन्हें एक बार फिर से देव से मजा लेने का बहाना मिल गया गंगा की ये कुंभकर्ण वाली सोने वाली आदत को जानकर।

सारे लोग विश्वयुद्ध स्तर पर गंगा और देव की शादी कराने के लिये सावधान मुद्रा में आ गये।

पण्डित ने अपनी लाल रंग की पोटली से मंत्रो वाली किताब निकाली। उसने विभिन्न मंत्र पढ़े। फिर एक तीन सिरे वाला कुश निकाला और गंगा के बाबू को दिया। गंगा के बाबू मतलब गंगासागर हलवाई से इसे पकड़ा। फिर गंगा की माँ रुकमणि ने भी इसे पकड़ा। फिर गंगा के बाबू ने अपनी एक हथेली दूसरी हथेली पर रखी। फिर उस पर गंगा की माँ का हाथ। फिर उस पर अपने हीरो देव का हाथ। फिर उस पर लड़ाका गंगा का हाथ।

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