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कविता संग्रह >> कह देना

कह देना

अंसार कम्बरी

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :165
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9580

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कह देना.... ग़ज़ल संग्रह

कृतज्ञता

आमतौर से रचनाकार अपनी पुस्तकों में भूमिका लेखन की परम्परा का निर्वाह करता है किन्तु मैं ऐसा नहीं कर रहा हूँ। निम्नलिखित पंक्तियों में मैंने जो कुछ कहा है वह केवल उन सह्रदय व्यक्तियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का प्रयास भर है जिनके आशीर्वाद, प्यार, स्नेह एवं सहयोग से मैं अब तक की अपनी काव्य-यात्रा निर्विघ्न रूप से तय कर पाया हूँ। शुरू कर रहा हूँ अपने श्रद्धेय पिताश्री स्व. ज़व्वार हुसैन रिज़वी के इस शेर से:-

अब तो मिल जायेगा उनको भी बराबर का जवाब
आईना   उनके  मुक़ाबिल  है  ख़ुदा  खै़र  करे

उक्त शेर उद्धत करने का अभिप्राय यह है कि कविता या शाइरी मुझे विरासत में मिली। मैंने ग़ज़लों के अतिरिक्त गीत व दोहे भी कहे हैं जिन्हें मैं “अंतस का संगीत” काव्य संग्रह ‘शिल्पायन’ दिल्ली के माध्यम से पहले ही आप तक पहुँचा चुका हूँ। प्रस्तुत संग्रह द्वारा मैं अपनी ग़ज़लें आपको सौंप रहा हूँ। आशा है कि मेरे गीतों और दोहों की तरह ही मेरी ग़ज़लें भी आपको पसंद आयेंगी, ग़ज़लें पढ़ने से पहले आईये ग़ज़ल को जाने :

ग़ज़ल की पैदाईश फ़ारस की वादियों में कब हुई उसकी तिथि के बारे में कुछ प्रमाणित तौर पर तो कहा नहीं सकता किन्तु जब ग़ज़ल वजूद में आई तो उस समय के हालात को देखते हुये यह कहा जा सकता है कि वह इतना प्रगतिशील नहीं रहा होगा। घोड़ो की हिनहिनाहट और तलवारों की झनझनाहट के बीच अपने महबूब से बातचीत करने के लिये जो तरीक़ा अपनाया गया उसको ग़ज़ल का नाम दिया गया। ग़ज़ल ने तपते रेगिस्तानों में महबूब से बात कर ठंडक का एहसास कराया, चिलचिलाती धूप में जुल्फों की छाँव सी राहत दी, साक़ी बनकर सूखे होंठों की प्यास बुझाई, मुहब्बत के नग्मों की ख़ुशबू बिखेरी और दिलों को सुकून पहुँचाया। उस समय ग़ज़ल का यही फ़र्ज़ था। अतः ग़ज़ल के विषय हुस्नों-इश्क़, जामो-मीनाओ-सागर रहे।

दिल में मोहब्बत और हुस्न की हरारत लिये ग़ज़ल का फ़ारस के बादशाहों ने गर्मजोशी से स्वागत किया। उसे दरबारों की शोभा बनाया। धीरे-धीरे महलों के भरपूर प्यार-दुलार, ऐशो-आराम के बावजूद ग़ज़ल को न जाने कौन सी बेचैनी हुई कि वह महलों से बाहर निकल कर पीरों-फ़क़ीरों की ख़ानकाहों और दरवेशों की चौखट तक आ पहुँची। इन्हीं सूफ़ियों-फ़क़ीरों, पीरो-मुर्शिदों और दरवेशों के संग-संग घूमती-फिरती ग़ज़ल ने हिंदुस्तान की सरज़मीन पर क़दम रखा। यहाँ उसको सावन मिला. फागुन मिला, नदियाँ मिली, झरने मिले, लहलहाते खेत, महमहाते बाग़ मिले, प्यार मिला, दुलार मिला, ग़रज़ कि वो इतनी भावविभोर हो गई कि यहीं रच-बस गयी।

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