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उपन्यास >> नदी के द्वीप

नदी के द्वीप

सच्चिदानंद हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :149
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9706

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व्यक्ति अपने सामाजिक संस्कारों का पुंज भी है, प्रतिबिम्ब भी, पुतला भी; इसी तरह वह अपनी जैविक परम्पराओं का भी प्रतिबिम्ब और पुतला है-'जैविक' सामाजिक के विरोध में नहीं, उससे अधिक पुराने और व्यापक और लम्बे संस्कारों को ध्यान में रखते हुए।


“लेकिन-मैं आपको देर तो नहीं कर दे रही हूँ? आपके मेज़बान....”

“शाम के भोजन का बन्धन मैं नहीं पालता, वह प्रतीक्षा नहीं करेंगे। पर आप को भी तो लौटना होगा-आपकी तो शायद हाज़री लगेगी।”

“आज देर से आने की छूट है-सप्ताह में दो दिन होती है।”

“लेकिन कुछ खायेंगी तो?”

“मैं तो केवल काफ़ी पीती हूँ-मैंने कहा न, बहुत सभ्य हूँ! पर आप...”

“मैं भी काफ़ी ही पिऊँगा।”

“नहीं, आपको कुछ खाना होगा, चलिए।”

तय हुआ कि टहलते हुए परले फाटक से निकल कर कश्मीरी दरवाज़े के अन्दर जाकर कुछ खाया-पिया जाये, और दोनों धीरे-धीरे उधर बढ़ने लगे।

कार्लटन में सन्नाटा था। शाम को उधर खाने कौन आता है? पीने आते हैं कुछ लोग, पर उनका समय निकल गया - नौ बजे तक कौन ठहरता है...पर खाने को मामूली कुछ मिल जाएगा - सैंडविच, कटलेट, वग़ैरह।

“सभ्य जीवन बड़ा भारी वेटिंग-रूम है मानो” रेखा बोली “और होटल वग़ैरह भी सब वक्त काटने के-बीच का एक रिक्त भरने के साधन हैं। लेकिन वेटिंग किसके लिए - रिक्त किसके और किसके बीच? कोई नहीं जानता। इधर-उधर फिर रिक्त है।”

“दो रिक्तों के बीच का रिक्त भरने के लिए रिक्त-तो फिर रेखा जी, ये पार्टिशन क्यों करती हैं, सारा ही तो एक रिक्त हुआ! सभ्यता की आपकी परिभाषा बड़ी डरावनी है। और उसे भरने के लिए भी रिक्त-विज्ञान तो सिर पीट लेगा जो मानता है कि प्रकृति भरणधर्मा है - रिक्त नहीं सहती।”

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