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उपन्यास >> नदी के द्वीप

नदी के द्वीप

सच्चिदानंद हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :149
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9706

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व्यक्ति अपने सामाजिक संस्कारों का पुंज भी है, प्रतिबिम्ब भी, पुतला भी; इसी तरह वह अपनी जैविक परम्पराओं का भी प्रतिबिम्ब और पुतला है-'जैविक' सामाजिक के विरोध में नहीं, उससे अधिक पुराने और व्यापक और लम्बे संस्कारों को ध्यान में रखते हुए।


रेखा ने सहसा बड़े तीखे काँपते स्वर में कहा, “चलिए-चलिए!” भुवन ने चौंक कर देखा, उसका स्वर ही नहीं, वह स्वयं भी काँप रही है। लड़खड़ाती-सी उसने भुवन का हाथ पकड़ा और किसी तरह जल्दी-जल्दी, कुछ उस पर झुकती हुई, कुछ उसे खींचती हुई नीचे उतर गयी।

नीचे पहुँच कर भी वह काँप रही थी। भुवन ने चिन्तित, आग्रहयुक्त स्वर में पूछा, “क्या बात है, रेखा जी - तबियत तो ठीक है न - या कि सीढ़ियाँ चढ़ने से।”

सहसा अपने में सिमट कर रेखा ने कहा, “नहीं, नहीं, कुछ नहीं; आप मुझे थोड़ी देर छोड़ जाइये।”

भुवन ने अनिच्छा से कहा, “लेकिन”

“मैं ठीक हूँ।”

भुवन खड़ा रहा।

“चले जाइये!” कहकर रेखा नीचे चौंतरे पर बैठ गयी। दोनों हाथ उठाकर उसने माथा पकड़ लिया, आँखें बन्द कर ली।

भुवन कुछ परे हट कर अनिश्चित-सा खड़ा रहा।

थोड़ी देर में रेखा ने सिर उठाया, उसकी आँखें सूनी थी। भुवन को वहाँ देखकर पहले बहुत ही छोटे निमिष के लिए सूनी ही रहीं, फिर सहसा उस पर केन्द्रित हो आयीं। उसने जल्दी-जल्दी कहा, “अच्छा लीजिए, सुनिए, सुन लीजिए-हेमेन्द्र-हेमेन्द्र का नाम आप जानते हैं न, मेरा पति-अपने एक युवा बन्धु को लेकर यहाँ आया था - यहाँ तारे को देखकर दोनों ने वफ़ा की कसमें खायी थीं - हेमेन्द्र ने मुझे बताया था।”

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