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उपन्यास >> नदी के द्वीप

नदी के द्वीप

सच्चिदानंद हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :149
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9706

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व्यक्ति अपने सामाजिक संस्कारों का पुंज भी है, प्रतिबिम्ब भी, पुतला भी; इसी तरह वह अपनी जैविक परम्पराओं का भी प्रतिबिम्ब और पुतला है-'जैविक' सामाजिक के विरोध में नहीं, उससे अधिक पुराने और व्यापक और लम्बे संस्कारों को ध्यान में रखते हुए।


गार्ड ने सीटी दी। रेखा ने हड़बड़ा कर इधर-उधर देखा, फिर घसीट कर कापी में लिखा “कहाँ चले गये तुम, भुवन-गाड़ी चलने वाली है - क्या अन्त में बिना विदा के ही मुझे जाना होगा?” कापी उसने बन्द की और खड़ी होकर दरवाज़े की ओर बढ़ी, बाहर झुकी।

सामने भुवन खड़ा मुस्करा रहा था।

“बड़े नालायक हैं आप!” रेखा सहसा कह गयी। “मुझे यों डराना अच्छा लगा है?”

भुवन ने कहा, “अभी तो बहुत टाइम है। डरा मैं नहीं गार्ड रहा है। आप बेशक बाहर चली आइये।”

रेखा उतर आयी और गाड़ी से कुछ हटकर भुवन के बग़ल खड़ी हो गयी। भुवन मुस्कराता ही जा रहा था। रेखा उसकी ओर देखने लगी : हाँ, यही अच्छा है, इसी प्रकार मुस्कराते हुए ही हट जाना चाहिए, वह भी मुस्करायेगी - एक मिनट की तो बात होती है, ज़रा से धीरज की, ज़रा मज़बूत नर्ब्ज़ की - बाद में चाहे जो हो...।

भुवन ने सहसा जेब में से कुछ निकाला, अंगूठे और उँगली से मसल कर उसकी गोली बनायी और ठोकर मारकर फुटबाल की तरह उछाल दी। रेखा ने कहा, “क्या था?”

गार्ड ने और गाड़ी ने एक साथ सीटी दी।

भुवन ने कहा, “मेरा प्लेटफ़ार्म टिकट।”

रेखा भौंचक उसे देखने लगी। भुवन बोला, “क्यों, यह गाड़ी भी छोड़नी है क्या? मैं चल रहा हूँ साथ-हापुड़ नहीं, मुरादाबाद।”

उसके साथ ही लपक कर रेखा अगले इण्टर की ओर बढ़ी - कितना अच्छा था उसके साथ कदम मिलाकर लपकना! उसे सवार करा कर भुवन भी उछल कर चलती गाड़ी में सवार हो गया।

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