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उपन्यास >> नदी के द्वीप

नदी के द्वीप

सच्चिदानंद हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :149
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9706

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व्यक्ति अपने सामाजिक संस्कारों का पुंज भी है, प्रतिबिम्ब भी, पुतला भी; इसी तरह वह अपनी जैविक परम्पराओं का भी प्रतिबिम्ब और पुतला है-'जैविक' सामाजिक के विरोध में नहीं, उससे अधिक पुराने और व्यापक और लम्बे संस्कारों को ध्यान में रखते हुए।


होटल साफ़-सुथरा था, पर लोग काफी थे। मैंनेजर से भुवन ने पूछा कि ठहरने की जगह मिल सकेगी? तो उसने तपाक से उत्तर दिया : “जी हाँ, डबल-रूम-कितने दिन के लिए?” और रजिस्टर की ओर हाथ बढ़ाते हुए, “किस नाम से”

क्षण-भर के लिए वह झिझक गया। मैनेजर के प्रश्न के साथ ही सभ्यता की जो समस्याएँ सहसा उसकी नज़र के आगे कौंध गयीं, उन पर उसने आते हुए विचार नहीं किया था। सँभलकर बोला, “अभी हमने निश्चय नहीं किया है कि यहीं ठहरेंगे या और आगे जाएँगे, ज़रा चाय-वाय पी लें तब तक सोचते हैं।”

“जी हाँ, अभी लीजिए”, कह कर मैनेजर ने आवाज़ दी, “बाय!”

'बाय' आया तो उससे कहा, “साहब का आर्डर ले लो – चाय, केक-पेस्ट्री वग़ैरह जो चाहें।”

रेखा कुछ पीछे थी। भुवन ने कहा, “आप ज़रा यहीं बैठिए, मैं अभी आया। सामान...”

पर रेखा साथ बाहर की ओर चली। बोली, “क्या बात है, भुवन?”

“कुछ नहीं।” भुवन क्षण भर रुक गया। फिर बोला, “मैं यहाँ नहीं ठहरूँगा - नैनीताल में ही नहीं।”

रेखा उसे देखती रही। उसका चेहरा उतर गया। “अभी वापस जाओगे?”

“यहाँ तो नहीं रहूँगा। या तो आगे चलें।”

“चलो।”

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