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उपन्यास >> नदी के द्वीप

नदी के द्वीप

सच्चिदानंद हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :149
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9706

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व्यक्ति अपने सामाजिक संस्कारों का पुंज भी है, प्रतिबिम्ब भी, पुतला भी; इसी तरह वह अपनी जैविक परम्पराओं का भी प्रतिबिम्ब और पुतला है-'जैविक' सामाजिक के विरोध में नहीं, उससे अधिक पुराने और व्यापक और लम्बे संस्कारों को ध्यान में रखते हुए।


उसकी ओर देखते हुए रेखा ने कहा, “डूबते सूर्य को कौन पकड़ सकता है?”

क्षण भर बाद भुवन के हाथ पर उसकी पकड़ फिर दृढ़ हो आयी। “मगर यह हार नहीं है। रात का अपना सौन्दर्य है। वह समान सौन्दर्य पहचानो, भुवन।”

भुवन घूमा। रेखा का दूसरा हाथ भी उसने पकड़ लिया और संझा के प्रकाश में थोड़ी देर उसका मुँह निहारता रहा। “पहचानता हूँ। तुम्हीं वह सौन्दर्य हो, नीलाम्बरा रात का सौन्दर्य; और तुम्हारे केशों में असंख्य तारे हैं।”

“और तुम-शुक्र तारा।” रेखा ने बहुत धीरे कहा। कोमल आग्रह से उसने हाथों से भुवन को निकट खींच लिया।

जरा परे हट कर भुवन ने मान से कहा, “क्यों, चाँद नहीं?”

“वेन मैन! नहीं, चाँद घटता-बढ़ता है। उसका बहुरूपियापन मुझे नहीं चाहिए। शुक्र, केवल शुक्र!” फिर हल्की-सी उसाँस लेकर, “चाहे कितनी जल्दी अस्त हो जाये!”

भुवन ने हाथों से उसकी आँखों को पकड़ते हुए धीरे-धीरे सिर हिलाया। हुँक्, उदास नहीं होना है! फिर रेखा के माथे की ओर देखते हुए, कविता की पंक्ति उद्धृत की, “एण्ड द स्टार्स इन हर हेयर वेयर सेवन।”

वह लौटने के लिए मुड़ा। बोला, “यहाँ जुगनू होते तो मैं थोड़े से पकड़ कर तुम्हारे बालों में फँसा देता।”

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