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उपन्यास >> नदी के द्वीप

नदी के द्वीप

सच्चिदानंद हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :149
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9706

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व्यक्ति अपने सामाजिक संस्कारों का पुंज भी है, प्रतिबिम्ब भी, पुतला भी; इसी तरह वह अपनी जैविक परम्पराओं का भी प्रतिबिम्ब और पुतला है-'जैविक' सामाजिक के विरोध में नहीं, उससे अधिक पुराने और व्यापक और लम्बे संस्कारों को ध्यान में रखते हुए।


सहसा वह चौंका। झीने रेशम के भीतर रेखा के कुचाग्र ऐसे थे, जैसे छोटे-छोटे हिम-पिण्ड...और अब तक जड़ रेखा के सहसा दाँत बजने लगे थे।

“पगली-पगली!”

भुवन ने एकदम खड़े होकर एक हाथ रेखा के कन्धे के नीचे डाला, एक घुटनों के; उसे कम्बल समेत खाट से उठाया और अपने बिछौने पर जा लिटाया। अपने कम्बल भी उसे उढ़ाये, और उसके पास लेटकर उसे जकड़ लिया।

सहसा रेखा ने बाँहे बढ़ाकर उसे खींच कर छाती से लगा लिया; उसके दाँतों का बजना बन्द हो गया। क्योंकि दाँत उसने भींच लिए थे; भुवन को उसने इतनी जोर से भींच लिया कि उन छोटे-छोटे हिम-पिण्डों की शीतलता भुवन की छाती में चुभने लगी...

फिर स्निग्ध गरमाई आयी। भुवन ने धीरे-धीरे उसकी बाहु-लता की जकड़ ढीली कर के उसे ठीक से तकिये पर लिटा दिया; और हाथ से उसकी छाती सहलाने लगा। चाँदनी कुछ और ऊपर उठ आयी थी; रेखा की बन्द पलकें नये ताँबे-सी चमक रही थीं।

दिस दाइ स्टेचर इज लाइक अंटु ए पाम ट्री, एण्ड दाइ ब्रेस्ट्स टू क्लस्टर्स आफ ग्रेप्स।

आइ सेड, आइ विल गो अप टू द पाम ट्री, आइ विल टेक होल्ड आफ़ द बाउज़ देयराफ : नाउ आल्सो दाइ ब्रेस्ट्स शैल बी एज़ क्लस्टर्स आफ़ द वाइन, एण्ड द स्मेल आफ़ दाइ नोज़ लाइक एपल्स।

(यह तुम्हारा कलेवर खजूर के तरु की भाँति है, और तुम्हारे उरोज दो अंगूर-गुच्छों से। मैंने कहा, मैं खजूर के तरु के समीप जाऊँगा और उसकी शाखाएँ गहूँगा, तेरे उरोज अँगूर-गुच्छों से होंगे और तेरे नासापुटों की गन्ध सेबों-सी।)

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